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Gwalior News: मेले का मसीहा बनने की छटपटाहट

Updated: | Wed, 02 Dec 2020 11:14 AM (IST)

Gwalior: Column (Tunkar): Vijay Singh Rathore

मेले का मसीहा बनने की छटपटाहट

दिसंबर माह शुरू हो गया, मगर ग्वालियर की शान कहे जाने वाले व्यापार मेले के आयोजन पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में व्यापारियों के मसीहा संगठनों के मुखियाओं में मेले का मसीहा बनने की छटपटाहट भी बढ़ गई है। बीते साल मेले में महाराज की मेहरबानी से व्यापारियों के मसीहा संगठन (चैंबर आफ कामर्स) के दो पदाधिकार अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बने थे। मगर जैसे ही महाराज ने पुरानी पार्टी का परित्याग कर जनसेवक बनने की घोषणा की, मेला प्राधिकरण के पद से इन दोनों ही व्यापारियों के मसीहाओं ने भी त्याग-पत्र दे दिया। उपचुनाव के बाद अब महाराज फिर से मजबूत हो गए हैं, ऐसे में महाराज की मेहरबानी पाने के लिए इंटरनेट मीडिया पर मसीहाओं द्वारा नंबर बढ़ाए जा रहे हैं। मगर कोरोना के कारण मेला आयोजन न होने की आशंका कहीं न कहीं मसीहाओं को व्यथित कर रही है।

-पुरानों को चुभ रहा नए महाराज का कोटा

ग्वालियर-चंबल अंचल के कारण मध्य प्रदेश की सियासत में जारी हलचल फिलहाल थमती दिखाई नहीं दे रही है। सर्वविदित है कि पूर्व की कमल नाथ सरकार का तख्तापलट करने के प्रमुख सूत्रधार महाराज रहे हैं। अपने साथ आए विधायक और मंत्रियों को उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़वाया। अब कांग्रेस के यह पुराने महाराज भाजपा के महाराज बन गए हैं। मगर पार्टी के पुराने नेताओं को नए नवेले महाराज का अघोषित सियासी कोटा चुभने लगा है। लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव, टिकट वितरण में महाराज का प्रत्यक्ष दखल कांग्रेस में रहता था। उपचुनाव में यह बात भाजपा में भी साबित हो गई है। अंचल में निकाय चुनाव की बेला शुरू होने को है। ऐसे में पार्षदी की तैयारी में जुटे पुराने भाजपाइयों को महाराज का कोटा लगने पर टिकट कटने का डर सता रहा है। यह डर गलत भी नहीं ।

-विधायकजी की पार्षदी बरकरार

उपचुनाव के परिणाम आए 20 दिन ही गुजरे हैं और शहर के 66 वार्डों में निकाय चुनाव का बिगुल फूंका जाने लगा है। विधायक बनने की राह में कई सालों तक पार्षदी करके ही ठाकुर साहब को काम चलाना पड़ा। अब जबकि दल बदल करके नेताजी पूर्व के विधायक बन गए हैं, तब भी ठाकुर साहब का पार्षदी वाला अंदाज बरकरार ही है। विधायकजी, वार्डों में सक्रिय हैं, सड़क आदि के लिए पूरे मन से भूमिपूजन करते हैं। वहीं ठाकुर साहब को पार्षद से विधायक बनाने में दर्जनों वार्डों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की मेहनत लगी। अब इस मेहनत के फल की उम्मीद व इंतजार कार्यकर्ता शिद्दत से कर रहे हैं। ललितपुर कॉलोनी स्थित कार्यालय में पार्षदी की चाह रखने वाले नेता, डबडबाती निगाहों से नेताजी की ओर देखते हैं। विधायकजी शायद'एक अनार 100 बीमार"वाली कहावत को मन में दोहराते होंगे और अपने पुराने दिन याद करते होंगे।

-निर्दलीय प्रत्याशी व नए दलों की रहेगी भरमार

दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर मामा ने पूरी रोटी खा ली। बचपन में यह कहानी पढ़ी थी, जो शायद ग्वालियर के आगामी निकाय चुनावों में भी चरितार्थ हो जाए। मध्यप्रदेश के प्रमुख दलों (कांग्रेस-भाजपा) में उपचुनाव के लिए थोक में दल-बदल हुआ, जिसके कारण दोनों ही दलों में असंतुष्टों की भरमार है। पार्षदी की चाह में पार्टी से चिपके कई पुराने नेताओं का टिकट इस बार नए नेताओं को साधने के फेर में कटना तय माना जा रहा है। ऐसे में ग्वालियर-चंबल में निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ ही नए सियासी दलों की बल्ले-बल्ले होने वाली है। दिल्ली में सरकार बनाकर बैठी आम आदमी पार्टी (आप), बिहार की जनता दल (यूनाइटेड) व उत्तरप्रदेश का प्रमुख सियासी दल समाजवादी पार्टी निकाय चुनाव में ताकत झोंकने वाली हैं। हिंदू महासभा भी अपने प्रत्याशी निकाय चुनाव में उतारने की घोषणा कर चुकी है।

Posted By: anil.tomar
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