Friendship Day Special 2021: कोरोना काल ने मजबूत हुई दाेस्ती, एक होकर सामना किया तो जीत ली जंग

Updated: | Sun, 01 Aug 2021 02:24 PM (IST)

Friendship Day Special 2021: ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। मित्र जीवन में सबसे बड़ा उपहार है। जिससे हम बेझिझक सारी परेशानियां, दुख-दर्द साझा कर हर परिस्थिती का हल तलाश ही लेते हैं। दोस्त दुख को कम और खुशियों को दोगुनी करने की जड़ी-बूटी की तरह होता है। जिस दर्द की दवा किसी वैद्य के पास नहीं मिलती वो दोस्त के पास होती है। वह चुटकियों में परेशानी को दूर कर देता है। यह रिश्ता दुख और सुख तक ही सीमित नहीं होता है। जिंदगी के सभी रिश्तों का सार दोस्ती है। बचपन से ही हमारे पैरेंट्स दोस्त बनाना सिखाते हैं, जिसे हम जिंदगीभर निभाते हैं। आज फ्रेंडशिप डे पर हम आपको ऐसे दोस्तों के बारे में बताएंगे जिन्होंने कोरोना काल में अपनी दोस्ती को सिद्दत से निभाया और भयावह स्थिती से अपने दोस्त व उसके परिवार को बाहर निकालकर लाए।

जब मेरी जेब में 50 रुपये थे,तब दोस्त ही थे जिन्होंने मदद कीः शिंदे की छावनी निवासी ऋषभ जैन ने अपने दोस्ती के सफर को साझा करते हुए बताया कि मैं इंजीनियरिंग का विद्यार्थी हूं। जब भी मेरे जीवन में परेशानी आई उनका डटकर सामना किया। मैं ही अपने घर में कमाने वाला हूं और कोचिंग पढ़ाकर अपना घर खर्च चलाता हूं, लेकिन लाकडाउन की वजह से मेरी कोचिंग बंद हो गई थी। जिससे मेरे घर की आर्थिक स्थिती बहुत खराब हो गई थी। मेरी हिम्मत टूट गई थी, लेकिन भगवान किसी न किसी रूप में सहायता करते ही हैं। यह बात मुझे अपने मित्र से साझा करने बहुत संकोच हो रहा था कि मेरी जेब में सिर्फ 50 रुपये ही बचे हैं, लेकिन मैंने एक दिन हिम्मत करके बता ही दिया। यह जानकर मेरे मित्र विवेक और पियूष ने मुझे इस विकट परिस्थिति में राशन और पैसों की मदद की। जिसकी वजह से मैं स्वयं के साथ अपने परिवार की भी देखरेख कर सका। उन दोनों का आभार व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। अच्छे और सच्चे मित्रों का होना जीवन में बहुत जरूरी है।

अपने दोस्त जुबेर को खून देकर प्रिंस ने बचाई जानः मुरैना जिले की तहसील अंबाह में रहने वाले दो दोस्त जुबेर और प्रिंस अलग-अलग धर्म से हैं। जुबेर नगर पालिका में काम करते हैं और प्रिंस अपना छोटा सा व्यापार संभालते हैं। उन दिनों शहर में कोरोना वैक्सीन का अभियान चल रहा था। अफवाहों के चलते जुबेर ने वैक्सीन नहीं लगवाई थी, लेकिन घरवालों के दबाव देने पर वो वैक्सीन लगवाने चला गया। कुछ साइड इफेक्ट तो वैक्सीन देती ही है, लेकिन जुबेर की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब होने लगी। उसने अपने दोस्त प्रिंस को फोन करके पूरी बात बताई, प्रिंस ने बिना देरी किए उसे प्राथमिक उपचार के लिए अंबाह अस्पताल में भर्ती करा दिया। अचानक रात में जुबेर की हालत ज्यादा खराब होने लगी और उस समय प्रिंस के अलावा वहां कोई नहीं था। प्रिंस नहीं समझ पा रहा था कि वो क्या करे। उसने भगवान का नाम लिया और जुबेर को लेकर सीधा जिला अस्पताल जा पंहुचा। घर जाने का समय नहीं मिला था तो पैसे भी नहीं थे। इधर उधर से करके उसने जुबेर को भर्ती कराया और जरूरत पड़ने पर अपना खून भी दिया। प्रिंस ने तब तक हार नहीं मानी जब तक डाक्टर ने खुद आकर ये नहीं कह दिया कि अब जुबेर ठीक है, अब आप आराम से घर ले जा सकते हैं। सुकून मिलता है ये जानकर कि दोस्ती की ऐसी मिसालें आज भी दुनिया में हैं।

कोरोना काल में सात समुंदर पार रहकर भी दोस्तों के रहे साथः एमआइटीएस एल्युमिनाई एसोसिएशन 1990 के बैच मेट्स आदेश गुप्ता ने बताया कि कोरोना काल में हमारे बैच के कुछ दोस्तों को कोविड हुआ था। जब इस बात का बैच के लोगों को पता चला तो सभी ने एक-दूसरे से बात कर एक प्लेटफॉर्म तैयार किया। जहां हर रोज एक समय पर 119 से ज्यादा दोस्त मिलते थे। एक-दूसरे के स्थिति के बारे में पूछते और उनकी मदद करते थे। अपने दोस्तों के जल्द स्वस्थ होने के लिए सभी दोस्तों ने जो जिस धर्म से था उसने वहां पूजा व हवन कराया। ग्वालियर से लेकर अमेरिका, जर्मनी, दुबई, सिंगापुर में रहने वाले सभी साथी उन्हें बचाने के लिए हर संभव प्रयास में जुटे रहे, लेकिन इतने प्रयासों के बाद भी हम अपने दोस्त आशुतोष चिंचोलकर को कोविड से नहीं बचा पाए। अपने दोस्त को खोने के बाद हम सभी ने समाज के लोगों को मदद पहुंचाना शुरू की, जिससे और किसी को हमारी तरह अपने दोस्त को ना खोना पड़े।

बचपन के दोस्त की 25 साल बाद की मददः अंकित शर्मा ने बताया कि कोरोना काल ने मेरे दोस्त धर्मेंद्र तोमर से 25 साल बाद मिलाया। इससे पहले उनकी बात धर्मेंद्र से नहीं होती थी, लेकिन कोविड के दौरान उसने कॉल करके मुझसे बात की तो मुझे बहुत अच्छा लगा। धर्मेंद्र जबलपुर में शासकीय सेवा में कार्यरत है। वे कोरोना की वजह से अपने घर ग्वालियर नहीं आ पा रहे थे और यहां उनकी पत्नी व भाई की तबीयत अचानक से खराब हो गई थी। धर्मेंद्र का अचानक से 25 साल बाद फोन आया हालांकि उसका नाम सुनकर मैं एक बार में उसे पहचान गया था। वह बहुत घबराया हुआ था जब उसने सारे हालातों के बारे में बताया तब मैं अपने लोगों को लेकर उसके घर पहुंचा और उसकी पत्नी, भाई को हॉस्पिटल ले जाकर चैकअप कराकर ट्रीटमेंट कराया। उस दौरान मुझे बहुत खुशी हुई जब उसने मुझे इतने सालों बाद इस लायक समझा।

दोस्त की मदद कर समाज की सेवा का मिला रास्ताः विकास जैन ने बताया कि कोरोना काल में मेरे दोस्त को कोविड हुआ। कोरोना को लेकर सभी में डर फैला हुआ था जिसकी वजह से उसके रिश्तेदार उसके पास नहीं आ रहे थे। उसके घर के सभी लोगों को कोरोना हो गया था। जब मेरे पास उसका फोन आया तो बोला घर में सभी को कोरोना हो गया है। क्या तुम खाना बनवाकर मेरे घर भेज दोगे। इसके बाद मैंने अपने घर पर खाना बनवाया और उसके घर भेजने लगा। उसके बाद लगा कि मेरे दोस्त जैसे ऐसे कई लोग होंगे, जिनके रिश्तेदार करीब नहीं होंगे और खाने के लिए पूरा परिवार परेशान होगा। इसके बाद मैंने अपने और दोस्तों को इकट्ठा किया फिर एक जगह खाना बनवाकर कोविड मरीजों के घर-घर भेजने लगा। मेरे जो दोस्त देश में अन्य जगहों पर या विदेश में रह रहे थे जब उनको अपने काम के बारे में बताया तो उन्होंने भी मुझे फंड देना शुरू कर दिया, जिससे मेरा काम और आसान हो गया।

शिक्षक और छात्र की दोस्ती ने की मिसाल कायमः एक अनोखे रिश्ते कि पहल है अंकुश और मयंक की दोस्ती। सात साल का मयंक ना देख सकता है और ना ही बोल-सुन सकता है, फिर भी एक रिश्ता उसको बहुत प्रेरित करता है और वो रिश्ता है दोस्ती का। मयंक डेढ़ साल पहले लाकडाउन कि वजह से शिक्षा से वंचित हो रहा था। उसके माता-पिता भी परेशान थे कि वह अपने बच्चाें की शिक्षा को कैसे जारी रखें। इसी बीच उनकी मुलाकात हुई अंकुश गुप्ता से जो दिव्य दृष्टि संस्था के संस्थापक हैं। वे विकलांग बच्चाें को पुनर्वास और शिक्षा निशुल्क प्रदान करते हैं। शुरुआती दिनों में मयंक जब यहां आया तब उसे बहुत दिक्कत होती थी, वह थोडा डरता और घबराता भी था। अमूमन बहुदिव्यांग में जब बालक एक या अधिक दिव्यांगता से ग्रसित होता है तब उनको किसी भी जगह खुद को ढालने मैं समय लग जता है, जो आमतौर पर बाकी विकलांग बच्चाें के मुकाबले थोड़ा ज्यादा कठिन होता है। मयंक ने भी अपना समय लिया और अब वह भी और बच्चाें की तरह वहां घुल-मिल गया है। इस रिश्तें मैं एक खास बात यह है कि अंकुश गुप्ता अब इस रिश्ते को छात्र व शिक्षक तक सीमित ना रखते हुए इसे दोस्ती का नाम दे चुके हैं। मयंक और अंकुश अब ना केवल अच्छे दोस्त हैं बल्कि इनकी घनिष्टता भी समय के साथ बढ़ गई है। अंकुश गुप्ता ने अब प्रण लिया है कि मयंक और उस जैसे अन्य बच्चाें को भी वह अपना दोस्त बनाएंगे और उनके भविष्य को बनाने का कार्य करेंगे। वे समाज को भी संदेश देना चाहते हैं कि दिव्यांग बच्चाें काे अपनाए क्योंकि वे भी हमारे समाज का हिस्सा है।

Posted By: vikash.pandey