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Gwalior injection ka dose: सत्ता पलटने के चक्कर में नेताजी

Updated: | Fri, 26 Feb 2021 12:10 PM (IST)

Gwalior injection ka dose: अजय उपाध्याय, ग्वालियर नईदुनिया। डाक्टरों के नेताजी इन दिनों मेडिकल कालेज की सत्ता पलटने के चक्कर में लगे हुए हैं, मगर उन्हें यह नहीं पता कि बड़े ठाकुर इन दिनों घर में आराम कर रहे हैं। ऊंट किस ओर बैठेगा, यह घर से ही तय होगा, आपके सोचने से नहीं। मगर नेताजी तो नेताजी ठहरे, उनका कहना है कि जब पुराने न रहे तो नए भी कब तक रहेंगे। 13 अंक का आंकड़ा जो न सुलझाएगा वह कुर्सी पर भी ज्यादा नहीं टिक पाएगा। नेताजी की मंशा को मेडिकल कालेज के बाबा को समझने में देर नहीं लगी। उन्होंने नारदजी के कानों में बात डाल दी कि अधीक्षक को ही डीन बना दिया जाए, क्योंकि अब मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। नारदजी की बातों को सुनकर खुश मत होना, क्योंकि बाबा जी ने पैंतरा फैंका है। कुर्सी के आसपास भी न भटकना नहीं तो मात खा जाओगे।

कोरोना लहर की आहट में टेबल पर सैनिटाइजरः कोरोना की दूसरी लहर देश के कुछ राज्यों में चल निकली है, चिंता सताई तो शहर में अफसरों की टेबल पर सैनिटाइजर फिर दिखाई देने लगा। मास्क पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। इधर अभी स्वास्थ्य अफसर सैनिटाइजर व मास्क पर ध्यान नहीं दे रहे। उनका कहना है कि जब उन्होंने वैक्सीन की बूटी ले ली तो फिर यह झंझट क्यों। मगर क्या करें झंझट तो है, क्योंकि आपको देखकर ही लोग मास्क व सैनिटाइजर के लिए प्रेरित होंगे और शारीरिक दूरी का पालन करेंगे। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी जब कोविड नियमों का पालन करेंगे तो उनके पास पहुंचने वाले मरीज व उनके अटेंडेंट भी कोरोना से बचाव के उपाय अपनाएंगे। बूटी भले ही स्वास्थ्य कर्मचारियों को मिली है, पर आमजन की पहुंच से अभी भी संजीवनी दूर है। बेहतर होगा फिलहाल बूटी को भूल, सुरक्षित दूरी बनाए रखें।

ओपीडी से गायब डाक्टर साहबः माधव डिस्पेंसरी की ओपीडी अब भी पटरी पर नहीं आ सकी, उल्टा कोरोना वापसी करने लगा। असल में लाकडाउन के समय जेएएच की डिस्पेंसरी में वरिष्ठ डाक्टरों ने ओपीडी में आना-जाना कम कर दिया था और उन्हें वरिष्ठता के आधार पर छूट भी दी गई थी। छूट का चस्का ऐसा लगा कि लाकडाउन समाप्त हुए महीनों बीत गए, आमजन की जिन्दगी फिर पटरी पर आ गई, लेकिन माधव डिस्पेंसरी की ओपीडी पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ सकी। हालांकि यह कहना गलत होगा कि वरिष्ठ डाक्टर बैठते ही नहीं, पर यह कहना उतना ही सही है कि न उनके आने का पता चलता है न जाने का। बस मरीज है कि बेचारे आते हैं और जूनियर डाक्टरों से ही इलाज लेकर लौट जाते हैं। अब वरिष्ठ तो वरिष्ठ ठहरे उन्हें कौन बताए कि घर की ओपीडी के अलावा सरकारी ओपीडी में भी बैठना जरूरी है।

टेंशन में सीएमएचओ साहबः इन दिनों सीएमचओ साहब टेंशन में हैं। हों भी क्यों न, पुराने साहब जो भोपाल में जोर मार रहे हैं। पता चला है कागज चलने लगा है, क्योंकि उस पर वजन जो बढ़ गया है। सीएमएचओ साहब ने भी सोच लिया कि जितना दाना-पानी लिखा होगा, वह कौन छीन सकेगा। लगा लें जिसे जितना भी जोर लगाना हो, मैं तो रमता जोगी बहता पानी हूं। उधर पुराने साहब को आज भी वो दिन सता रहे हैं जब कुछ लोगों की लाबी ने उन्हें कुर्सी से बेदखल करा दिया था। अब एक बार फिर उन्हें कुर्सी पर आना है और बताना है कि कुर्सी कैसे हासिल की जाती है, क्योंकि कुछ लोगों का हिसाब चुकाना अभी बाकी है। एक तो वह जो कभी पैरों में आकर गिड़गिड़ाए थे, जो अब आंख के अस्पताल में बैठकर सीएमएचओ कार्यालय की मलाई मार रहे हैं। दूसरे वे जो खरीदारी में अपना हुनर दिखा रहे हैं।

Posted By: vikash.pandey
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