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Gwalior News: आंगनबाड़ी में पोषण-मटके की टिम्बक टू

Updated: | Wed, 27 Jan 2021 08:22 AM (IST)

Gwalior News: ग्वालियर. नईदुनिया प्रतिनिधि। आपको बचपन में पढ़ी कविता 'टिम्बक-टू' और उसमें बुढ़िया और वह मटका याद है? वही मटका, जिसमें बुढ़िया रामू के चीते-शेरों से बचते-बचाते अपनी ससुराल पहुंच गई थी। मटका उस बुढ़िया के बहुत काम आया था। मध्यप्रदेश में भी इन दिनों गांव-गांव में ऐसे ही मटके की चर्चा हो रही है। यह पोषण-मटका गांव-गांव में नजर आ रहा है। इस मटके में लोग खास चीजों को भर रहे हैं। वह भी एक खास वजह से और यह वजह है महिलाओं और बच्चों को पोषण के महत्व को बताना और साथ ही स्वास्थ्य और पोषण के लिये समुदाय को प्रोत्साहित करना। 'पोषण-मटका' लोगों के बीच अच्छी पोषण प्रथाओं के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिये आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को शामिल करने वाला एक सामुदायिक दृष्टिकोण है।

मध्यप्रदेश में हर-एक आंगनबाड़ी में 'पोषण-मटका' अभियान आंगनबाड़ी की दीदियों द्वारा पोषण माह (हर वर्ष सितम्बर माह के रूप में मनाया जाता है) में चलाया जा रहा है। इसका व्यापक असर दिखायी दे रहा है। लोग मटके के माध्यम से खुद को आंगनबाड़ी से जोड़ रहे हैं। किसी के घर में सब्जी है, तो सब्जी, किसी के घर में अनाज है, तो अनाज, किसी के घर में दालें हैं, तो दाल, सब अपनी स्वेच्छा से, जो है, जितना है, 'पोषण-मटके' में भर रहे हैं। इससे दो फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि समुदाय के लोग सीधे तौर पर आंगनबाड़ियों से जुड़ रहे हैं और दूसरा उनमें कमजोर बच्चों और महिलाओं के प्रति एक जागस्र्कता आ रही है, एक समझ विकसित हो रही है, कमजोरी दूर करने की, कुपोषण को दूर भगाने की, अपने समुदाय को सशक्त बनाने की। इस प्रयोग से लोगों के खान-पान में भी विविधता आ रही है।

'पोषण-मटके' का एक लाभ यह भी हो रहा है कि इसके माध्यम से स्थानीय पोषण आहारों का संग्रह हो रहा है, जो समुदाय के अति-कम वजन और कम वजन के कमजोर बच्चों और उनके परिजनों तक आंगनबाड़ी के माध्यम से पहुंच रहा है। इससे पोषण में विविधता भी आयेगी और कमजोर पोषण वाले बच्चों और महिलाओं की स्थिति भी मजबूत होगी। फाउण्डेशन के सर्वे अनुसार राज्य में 'पोषण-मटका' की शुरूआत से विभिन्ना ब्लॉकों में कुल 9404 'पोषण-मटके' बनाये गये हैं। कुल 39 हजार 220 लोगों-परिवारों ने मटके को खाद्यान्ना से भरकर इस अभियान में योगदान दिया, कुल 36 हजार से ज्यादा परिवार 'पोषण-मटका' पहल के लाभार्थी बने।

'पोषण-मटका' अभियान से जुड़ी सुपरवाइजर सुषमा सोनी कहती हैं कि इस अभियान को समुदाय से बहुत अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। इसमें पुरुषों की भागीदारी भी हो रही है। वे कहती हैं कि बच्चा यदि कुपोषित है, तो केवल माता के कारण नहीं, बल्कि पोषण पर ध्यान देने की जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की ही होती है। पोषण मटका जैसी सामुदायिक पहल- सांस्कृतिक, आर्थिक समानता और प्रभावी हस्तक्षेप के सामाजिक मूल्यों को पहचानती हैं, जो स्थानीय रूप से सशक्त कार्रवाई और 'पोषण अभियान' में सामाजिक भागीदारी को बढावा देती है।

Posted By: anil.tomar
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