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Navratri 2020 : समापन की ओर नवरात्र महोत्सव, अष्टमी तिथि के साथ शुरू होंगे हवन, ऐसे करें कन्‍या पूजन

Updated: | Sat, 24 Oct 2020 12:50 PM (IST)

Navratri 2020 : ग्वालियर। शारदीय नवरात्र के पावन दिनों में श्रद्धालु शक्ति की भक्ति में जुटे हुए हैं। नवरात्र महोत्सव अब समापन की ओर है। ऐसे में शहर के मंदिरों में जहां सुबह से ही भक्तों की कतार मां के दर्शन के लिए लग रही है। वहीं शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित शीतला माता के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु पैदल पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को अष्टमी तिथि शुरू होने वाली है, ऐसे में मां की विशेष पूजा-अर्चना के साथ ही हवन आदि की तैयारी शुरू हो जाएगी। ज्योतिषाचार्य डॉ.दीपक गोस्वामी ने बताया कि शुक्रवार शाम 4:38 बजे अष्टमी तिथि का उदय होने के साथ ही हवन आदि शुरू हो जाएंगे। शनिवार को नवमी दोपहर 2:58 बजे प्रारंभ हो जाएगी, ऐसे में हवन आदि के बाद कन्या पूजन का आयोजन होगा। इस बार नवरात्र के समापन पर कोरोना के कारण भंडारों का आयोजन सीमित स्थानों पर ही हो रहा है। माता विराजमान कराने वाली विभिन्न समितियों ने भंडारा न कराते हुए केवल कन्याओं को भोजन कराने का निर्णय लिया है। रविवार को नवमी पर माता का विसर्जन शुरू किया जाएगा। ज्योतिषाचार्य पं.गौरव उपाध्याय ने बताया कि रविवार को विजया दशमी (दशहरा) की भी तिथि है, जो अगले दिन सोमवार तक रहेगी। गौरतलब है कि दशहरा पर अस्त्र-शस्त्र, औजार, वाहन आदि का पूजन करने की मान्यता है। इसके साथ ही दशहरा घर, जमीन, सोना-चांदी, कपड़ा, वाहन आदि सभी प्रकार की खरीदी के लिए शुभ मुहूर्त होता है।

जानिये कन्‍या पूजन से जुड़ी ये काम की बातें

कन्या पूजन के लिए बुलाई गयी कन्याओं की मां के समान पूजा की जाती है। उनकी सेवा के बाद उन्हें ख़ुशी ख़ुशी विदा करने से माता मुरादें पूरी करती हैं। इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि इस साल कंजक पूजन के लिए शुभ मुहूर्त क्या है और किस विधि से इसे संपन्न करना है। कन्या या कंजक पूजन के लिए शुभ मुहूर्त। आप इन शुभ मुहूर्त पर भी कंजक बिठा सकते हैं: सुबह 06:41 से 08:13 सुबह 11:56 से दोहपर 12:47 तक दोहपर 02:28 से शाम 03:19 तक कैसे करें पूजा नवरात्रि का व्रत रखने वालों के लिए कंजक पूजना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसके बिना इनका व्रत अधूरा रह जाता है। ऐसी मान्यता है दुर्गा मैया को खुश करना है तो कंजक जरूर बिठाएं। इसके लिए कम से कम नौ कन्याएं होनी चाहिए। यदि नौ से अधिक बालिकाएं आती हैं तब भी कोई समस्या नहीं है। इन कन्याओं की आयु दो से दस साल तक की होनी चाहिए। नौ कन्या के साथ एक बालक (लंगुरिया) भी बिठाएं। एक एक करके सभी कन्या के पैरों को थाल में रख कर जल से धोएं और साफ़ कपड़े से पोंछ कर स्थान पर बिठाएं। माना जाता है कि इससे पापों का दमन होता है। अब पंक्ति से बैठी कन्याओं और बालक को तिलक लगाएं। उनके हाथ में मौली बांधे। अब उनको नए थाली में भोजन परोसें। उन्हें भोग लगाने के लिए इस दिन खासतौर पर हलवा-पूरी, चना तैयार किया जाता है। इसके साथ आप उन्हें मिठाई, प्रसाद और वस्त्र आदि भी दे सकते हैं। जब कन्याएं भोजन कर लें तब उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें। यदि आपके जीवन में किसी तरह की कठिनाई है और माता का आशीर्वाद चाहते हैं तो कन्या पूजन के जरिए उनकी कृपा पा सकते हैं। एक बात का ध्यान रखिए कि कन्या जो है 9 साल से उम्र में छोटी होनी चाहिए खास करके प्रत्येक कन्या को अगर आप हरा कपड़ा हरा चूड़ी या हरे वस्त्र अगर दान करते हैं तो आपको बड़ा लाभ होगा तथा आपके कुंडली के अनुसार बुध का यह सबसे बड़ा कारगर उपाय साबित होगा जो हो जाएगा।

जानिये दशहरे का महत्‍व और मान्‍यताएं

दशहरा का त्योहार पूरे देश में धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। दशहरा हर साल अश्विन मास की दशमी तिथि को मनाया जाता है। दशहरा को विजयादशमी के नाम से भी जानते हैं। विजयादशमी के दिन रावण फूंकने की भी परंपरा है। पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था। भगवान राम के रावण पर विजय प्राप्त करने के कारण ही इस दिन को विजयादशमी कहा जाता है। इसके अलावा इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का भी वध किया था। हालांकि इस साल दशहरा की तारीख को लेकर लोगों के बीच कंफ्यूजन है।

दशहरा 2020 की सही तारीख और शुभ मुहूर्त-

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल दशहरा का त्योहार 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। दशहरा, दिवाली से ठीक 20 दिन पहले मनाया जाता है। हालांकि इस साल नवरात्रि 9 दिन के न होकर 8 दिन में ही समाप्त हो रहे हैं। इसके पीछे का कारण है- अष्टमी और नवमी का एक ही दिन पड़ना। 24 अक्टूबर को सुबह 6 बजकर 58 मिनट तक ही अष्टमी है, उसके बाद नवमी लग जाएगी।

दशमी तिथि प्रारंभ - 25 अक्टूबर को सुबह 07:41 मिनट से

विजय मुहूर्त - दोपहर 01:55 मिनट से 02 बजकर 40 तक।

अपराह्न पूजा मुहूर्त - 01:11 मिनट से 03:24 मिनट तक।

दशमी तिथि समाप्त - 26 अक्टूबर को सुबह 08:59 मिनट तक रहेगी। दशहरा के दिन में सीमा उल्लंघन की भी पता है और तो और अपने जो साधन है गाड़ी घर व्यवसाय की जगह शब्दों के साथ करके पवित्र करके उनकी पूजा की जाती है और तो और उस दिन शमी की पत्तों का दान किया जाता है और जब हम नए वस्त्र परिधान करके गांव की सीमा लांड कर आ जाते हैं घर में तब हमारे घर की महिलाएं हमारा ऑक्शन करके मतलब यह की हमारा दिए की थाली से पूजा की जाती है कुछ मीठा खिलाया जाता है और हमारी एक नई शुरुआत हो जाती है।

नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री

● माँ दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र

● लाल चुनरी

● आम की पत्तियाँ

● चावल

● दुर्गा सप्तशती की किताब

● लाल कलावा

● गंगा जल

● चंदन

● नारियल

● कपूर

● जौ के बीच

● मिट्टी का बर्तन

● गुलाल

● सुपारी

● पान के पत्ते

● लौंग

● इलायची

नवरात्रि पूजा विधि

● सुबह जल्दी उठें और स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें

● ऊपर दी गई पूजा सामग्री को एकत्रित करें

● पूजा की थाल सजाएँ

● माँ दर्गा की प्रतिमा को लाल रंग के वस्त्र में रखें

● मिट्टी के बर्तन में जौ के बीज बोयें और नवमी तक प्रति दिन पानी का छिड़काव करें

● पूर्ण विधि के अनुसार शुभ मुहूर्त में कलश को स्थापित करें। इसमें पहले कलश को गंगा जल से भरें, उसके मुख पर आम की पत्तियाँ लगाएं और उपर नारियल रखें। कलश को लाल कपड़े से लपेंटे और कलावा के माध्यम से उसे बाँधें। अब इसे मिट्टी के बर्तन के पास रख दें

● फूल, कपूर, अगरबत्ती, ज्योत के साथ पंचोपचार पूजा करें

● नौ दिनों तक माँ दुर्गा से संबंधित मंत्र का जाप करें और माता का स्वागत कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें

● अष्टमी या नवमी को दुर्गा पूजा के बाद नौ कन्याओं का पूजन करें और उन्हें तरह-तरह के व्यंजनों (पूड़ी, चना, हलवा) का भोग लगाएं

● आखिरी दिन दुर्गा के पूजा के बाद घट विसर्जन करें इसमें माँ की आरती गाएं, उन्हें फूल, चावल चढ़ाएं और बेदी से कलश को उठाएं

भारत में इस तरह मनाया जाता है नवरात्रि का पावन पर्व

नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ दुर्गा के लाखों भक्त उनकी हृदय से पूजा-आराधना करते हैं। ताकि उन्हें उनकी श्रद्धा का फल माँ के आशीर्वाद के रूप में मिल सके। नवरात्रि के दौरान माँ के भक्त अपने घरों में का माँ का दरवार सजाते हैं। उसमें माता के विभिन्न रूपों की प्रतिमा या चित्र को रखा जाता है। नवरात्रि के दसवें दिन माँ की प्रतिमा को बड़ी धूमधाम के साथ जल में प्रवाह करते हैं। पश्चिम बंगाल में सिंदूर खेला की प्रथा चलती है। जिसमें महिलाएँ एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। गुजरात में गरबा नृत्य का आयोजन किया जाता है। जिसमें लोग डांडिया नृत्य करते हैं। उत्तर भारत में नवरात्रि के समय जगह-जगह रामलीला का आयोजन होता है और दसवें दिन रावण के बड़े-बड़े पुतले बनाकर उन्हें फूंका जाता है।

नवरात्रि से संबंधित पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है कि महिषासुर नामक राक्षस ब्रह्मा जी का बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति को देखकर शृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए और उसे यह वरदान दे दिया कि कोई देव, दानव या पुरुष उसे मार नहीं पाएगा। इस वरदान को पाकर महिषासुर के अंदर अहंकार की ज्वाला भड़क उठी। वह तीनों लोकों में अपना आतंक मचाने लगा।

इस बात से तंग आकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सभी देवताओं ने मिलकर माँ शक्ति के रूप में दुर्गा को जन्म दिया। कहते हैं कि माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और दसवें दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इस दिन को अच्छाई पर बुराई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

एक दूसरी कथा के अनुसार, त्रेता युग में भगवान राम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले शक्ति की देवी माँ भगवती की आराधना की थी। उन्होंने नौ दिनों तक माता की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ स्वयं उनके सामने प्रकट हो गईं। उन्होंने श्रीराम को विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। दसवें दिन भगवान राम ने अधर्मी रावण को परास्त कर उसका वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। इस दिन को विजय दशमी के रूप में जाना जाता है।

Posted By: Navodit Saktawat
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