Indore Mukesh Mangal Column: वर्षों बाद मैदानी पदस्थापना के साथ खत्म हुआ वनवास

Indore Mukesh Mangal Column: नवागत डीजीपी सुधीर कुमार सक्सेना ने हाल ही अरविंद तिवारी को झाबुआ का एसपी बनाया।

Updated: | Tue, 17 May 2022 02:06 PM (IST)

ndore Mukesh Mangal Column मुकेश मंगल, इंदौर, नईदुनिया। एक समय था जब किसी भी बड़े अपराध की गुत्थी सुलझाने के लिए अरविंद तिवारी वरिष्ठ अधिकारियों की पहली पसंद हुआ करते थे। आइजी अनुराधा शंकर, डीआइजी ए.साईं मनोहर जैसे अफसरों के पसंदीदा रहे तिवारी ने सीएसपी और एएसपी के रूप में बैंक डकैती, हत्या और अपहरण जैसे कई मामलों को सुलझाने में सफलता पाई थी। आइपीएस अवार्ड मिलते ही तत्कालीन डीजीपी विवेक जौहरी ने उन्हें इंदौर मुख्यालय में ही बैठा दिया। उन्हें मैदानी पदस्थापना दिलाने की शुभचिंतक अफसरों की कोशिशें भी तब नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुईं। यह भी संयोग रहा कि आज पुलिस नियंत्रण कक्ष की इमारत में कभी एएसपी तो कभी डीसीपी बनकर बैठे तिवारी छात्र जीवन में भी यहां संचालित छात्रावास में भी रहे हैं। नवागत डीजीपी सुधीर कुमार सक्सेना ने हाल ही उन्हें झाबुआ का एसपी बनाया। इसी के साथ तिवारी का लूपलाइन रूपी 'वनवास' खत्म हुआ।

जनसुनवाई से वरिष्ठ अफसर बना रहे दूरी

जनता की सुविधा के लिए शुरू हुई जनसुनवाई भी लापरवाही का शिकार हो रही है। एक समय था जब जनसुनवाई में शिकायत पहुंचते ही थाना प्रभारियों की सांसें ऊपर-नीचे होने लगती थीं। शिकायत का निराकरण करना पड़ता था और क्या कार्रवाई की, इसका विवरण भी अफसरों को देना होता था। आज स्थिति बदल गई है। अब आम आदमी की थानों पर तो सुनवाई नहीं होती है, लेकिन वरिष्ठ अफसर भी मिलने से कतरा रहे हैं। पुलिस नियंत्रण कक्ष पर प्रत्येक मंगलवार को जनसुनवाई का आयोजन औपचारिकता भर बन कर रह गया है। वहीं दो-दो अतिरिक्त पुलिस आयुक्त बैठे होने के बाद भी जनसुनवाई में दो सहायक पुलिस आयुक्तों (एसीपी) को भेज दिया जाता है। मुख्यधारा से दूर दोनों एसीपी न तो किसी थाना प्रभारी या एसीपी को जानते हैं, न थाना प्रभारी उनका फोन उठाते हैं। जनसुनवाई की बिगड़ती दशा देख आवेदकों ने भी आना कम कर दिया है।

पुलिस आयुक्त की ग्रेडिंग से क्यों नहीं डरते टीआइ!

एक ही थाने पर वर्षों से जमे थाना प्रभारियों को बदलने की कवायद होता ही संबंधित टीआइ अपने राजनीतिक आकाओं की शरण में पहुंच जाते हैं। कम से कम ए श्रेणी में आने वाले अधिकांश थानों पर तो नेताओं के वरदहस्त का ही बोलबाला रहा है। इस बार हालात थोड़े बदले हैं। आयुक्त हरिनारायणाचारी मिश्र ने कामकाज को लेकर थाना प्रभारियों की ग्रेडिंग सूची बनाई है। खास बात यह इस सूची में ए श्रेणी वाले थानों के एक भी टीआइ का नाम नहीं है, जिनके कामकाज से आयुक्त संतुष्ट हों। इसके बाद भी उन थाना प्रभारियों ने अपने नेताओं के माध्यम से समकक्ष थानों में पदस्थापना या तबादले की बुकिंग कर ली है। उनके लिए सच यही है कि जब सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का। यह पहला मौका नहीं है जब पदस्थापना को लेकर इतनी खींचतान मची हो। इसके पहले भी नेताओं की खींचतान में अफसरों को दो महीने तक तबादला सूची रोकनी पड़ी थी।

कमजोर कड़ी कौन, तलाश रहे अफसर

जिसमें दम हो वो ही फील्ड में रहे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इस बयान के बाद शहर के पुलिस विभाग में भी कमजोर अफसरों की तलाश शुरू हो गई है। शहर में गुना जैसे हालात तो नहीं, लेकिन कुछ पुलिस उपायुक्त हैं जिनकी न तो काम में रुचि है, न थाना प्रभारियों पर पकड़ है। पब और वसूली कांड जैसे घटनाक्रम होने के बाद भी मातहतों पर कोई प्रभाव न होने से कमजोर कड़ी साबित हुए डीसीपी से अफसर संतुष्ट नहीं हैं। इंटेलिजेंस ने भी अपनी गोपनीय रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया है कि कुछ थाना प्रभारी निगरानी की कमी के कारण ऐसे कामों में लिप्त रहते हैं, जो उनके पद के अनुकूल नहीं हैं। रिपोर्ट के बाद शहर के कुछ डीसीपी पर गाज गिर सकती है। कुछ डीसीपी ऐसे भी हैं जिन्हें उनके कामकाज के कारण मैदानी मौका मिल सकता है।

Posted By: Sameer Deshpande
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.