Indore Ka Man : संस्कृति से संपन्न इंदौर में कलाकारों को मिले अवसर व सम्मान

Indore Ka Man : इंदौर कला, संस्कृति व संस्कार की धरा है। बदलते समय में भी इसकी यह पहचान बनाए रखने के प्रयत्न करने होंगे।

Updated: | Fri, 27 May 2022 04:30 PM (IST)

Indore Ka Man : पंडित डा. गोकुलोत्सव महाराज, पद्मभूषण सम्मान प्राप्त संगीत गुरु। बस्ती बसना खेल नहीं, यह बसते-बसते ही बसती है...। इंदौर की धरती पर कला और संस्कृति की भी यही कहानी है। यहां कला और संस्कृति की बस्ती भी आज फुलवारी के रूप में हमें नजर आ रही है। शाम को हवाखोरी के लिए जाना और बादाम-पिस्ते की ठंडाई के साथ सर्वोत्तम स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेना। दाल-बाफले, पूरणपोली, गुलाब जामुन, घेवर-रबड़ी, रस-पूड़ी और काव्यपाठ के साथ मालवी आम की दावत का लुत्फ। रवादार कलाकंद के साथ-साथ सांस्कृतिक वार्तालाप और गोष्ठी व संगीतमय महोत्सव की छटा देखते ही बनती थी।

इंदौर वही शहर है, जिसकी धरती पर राधाकृष्ण बहल के दंगल का आयोजन होता था। यहां अखाड़े, फ्री-स्टाइल कुश्ती में दारा सिंह, जोगेंदर सिंह के दांव देखने के लिए सब लालायित रहते थे। तब शहर की एक पहचान पहलवानों के शहर के रूप में भी थी। आज अखाड़ों के स्थान पर जिम हैं, जहां 50 हजार रुपये की मैंबरशिप लेकर भी लोग जाने लगे हैं। इंदौर को बाहर से आकर यहां बस गए कई बड़े कलाकार मिले हैं, तो इस शहर ने भी देश को कई नामी कलाकार दिए हैं। यह परंपरा आज भी गति व प्रगति को आगे बढ़ा रही है।

एक वह दौर था, जब सांस्कृतिक व संगीतमय आयोजनों के साक्षी बनने के लिए शहर के लोग उत्सुक रहते थे। आज श्रोता-दर्शक त्रस्त भी हैं और व्यस्त भी। सांस्कृतिक आयोजनों के लिए पहले रात 10 बजे तक की समयसीमा जैसी कोई बात नहीं थी। रात में सभा सजती थी, तो उगते सूरज के साथ संपन्न होती थी। आज प्रस्तुतियों के समय पर पाबंदी है, यद्यपि इसके बावजूद परंपरा बरकरार है। हालांकि कलाकारों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है, खासतौर पर नवोदित कलाकारों की। उभरते कलाकार तो कई बार उचित मंच तक पहुंचते-पहुंचते ही कलाकारों की राजनीति का शिकार हो जाते हैं। सबसे पहले तो कला जगत की राजनीति बंद होना चाहिए। जातिवाद, भाषावाद, प्रांतवाद और क्षेत्रवाद कला की कमर तोड़ रहे हैं।

यह वही शहर है, जहां कला के क्षेत्र में कई नवाचार हुए। इनमें सर्वांग गायकी का सृजन भी है, जिसे रचने का सौभाग्य मुझे मिला। साजों व प्रस्तुतियों में भी नवाचार हुआ। यदि नवसृजन की परंपरा को और भी आगे बढ़ाना है तो कलाकारों, विद्वानों, साहित्यकारों को उचित मानदेय, मान सम्मान, पुरस्कार और स्तरीय आयोजनों में भाग लेने का अवसर देना होगा। आखिर कलाकार को भारत की परंपरा को भी सहेजना है और परिवार का पालन भी करना है। ऐसे में आवश्यक है कि चयन समिति में आरूढ़ निर्णायकों में उदारता होनी चाहिए, तभी शहर में एक बार फिर कला का सर्वोन्मुखी विकास संभव होगा। चयन समिति के सदस्यों की कार्यावधि एक वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिए, ताकि हर कलाकार को प्रतिभा दिखाने का उचित अवसर मिल सके।

Posted By: Hemraj Yadav
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.