विश्व दिव्यांग दिवस पर विशेष : ये हैं मध्य प्रदेश के स्टीफन हॉकिंग, जानिये इनकी खूबियां

Updated: | Thu, 02 Dec 2021 09:25 PM (IST)

ईश्वर शर्मा, इंदौर/उज्जैन। महान विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग की कहानी हम सबने सुनी है कि उन्होंने पूरा शरीर नाकाम होने के बावजूद दिमाग की ताकत से ब्रह्मांड के रहस्य सुलझाने के प्रयास किए। मध्य प्रदेश के उज्जैन निवासी सुबोध जोशी भी ऐसे ही शख्स हैं, जिनका सिर्फ दिमाग और दाएं हाथ का अंगूठा काम करता है, बाकी पूरा शरीर निस्तेज है। मांसपेशियों को शिथिल कर नाकाम कर देने वाली मस्क्युलर डिस्ट्राफी बीमारी से पीड़ित जोशी ने भी अपने दिमाग की ताकत का सकारात्मक उपयोग किया।

उन्होंने दिमाग को इतना योग्य बनाया कि अब अमेजन जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनी सहित भारतीय टेक कंपनी विप्रो व अन्य 10 कंपनियां तथा अजीम प्रेमजी फाउंडेशन जैसे गैर सरकारी संगठन अपने महत्वपूर्ण दस्तावेजों के अनुवाद के लिए इनसे अनुरोध करते हैं।

पल-पल पास आती मृत्यु को अपनी जीवटता से जीत लेने वाले 57 वर्षीय सुबोध जोशी जब तीन वर्ष के थे, तब माता-पिता को पहली बार पता चला कि बेटे को मस्क्युलर डिस्ट्राफी है। इसमें उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं और एक समय ऐसा आता है जब पूरा शरीर नाकाम हो जाता है। व्यक्ति हिल-डुल तक नहीं सकता। श्री जोशी भी जैसे-जैसे बड़े होते गए, एक-एक कर उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया। 29 वर्ष की जवान उम्र में उनकी मांसपेशियों ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया।

शरीर न सही...तो दिमाग ही सही

जोशी ने मस्क्युलर डिस्ट्राफी पर गहन शोध किया, तो पता चला कि इसका कोई इलाज ही नहीं। तय था कि अब शरीर की क्षमता घटती चली जाएगी, अत: उन्होंने दिमाग को कुशाग्र बनाना शुरू किया। वर्ष 1988 में उन्होंने तब उज्जैन में कंप्यूटर सेंटर शुरू कर दिया था, जब देश में कंप्यूटर क्रांति शुरू ही हुई थी। यह काम नौ वर्ष तक करने के बाद 17 वर्षों तक विभिन्न् एनजीओ के लिए काम किया। 2016 आते-आते जब शरीर पूरी तरह निष्क्रिय होने लगा तो उन्होंने घर में बैठकर अनुवाद का काम शुरू किया। हिंदी अच्छी थी, अंग्रेजी पर भी कमांड किया।

भाषा की सटीकता और बेहतरीन अनुवाद के कारण कई कंपनियां उनसे अनुवाद करवाने लगीं। कुछ वर्षों में इतनी ख्याति हुई कि अमेजन के यूरोप स्थित आफिस ने भारत में लांच होने वाले अपने उत्पादों सहित कानूनी व अन्य दस्तावेजों का अनुवाद इनसे करवाना शुरू कर दिया। जोशी अब विशेष तरह से डिजाइन अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे कंप्यूटर व मोबाइल की सहायता से कंपनियों का काम इतनी सटीकता से करते हैं कि 10 से अधिक बड़ी कंपनियों व एनजीओ ने इन्हें अपना 'मास्टर ट्रांसलेटर' (विशेषज्ञ अनुवादक) बना रखा है।

बोझ बनने के बजाय देते हैं रोजगार

मस्क्युलर डिस्ट्राफी व्यक्ति के शरीर को नाकाम कर देती है, लेकिन जोशी अपने परिवार पर बोझ बनने के बजाय पूरे स्वाभिमान के साथ खुद का पालन-पोषण भी कर रहे हैं और दो लोगों को रोजगार भी देते हैं। इन्हें सुबह बिस्तर से गोद में उठाने, नहलाने, कपड़े पहनाने व काम के लिए कंप्यूटर टेबल पर बैठाने का काम सेवक बालू सिंह करते हैं। वे ही शाम को टेबल से उठाकर फिर नहलाते, कपड़े बदलते व बिस्तर पर सुलाते भी हैं। दूसरे सेवक राहुल वर्मा हैं, जो दिनभर श्री जोशी के साथ रहकर उनके भोजन, पानी, सेवा का ध्यान रखते हैं। इन दोनों का वेतन श्री जोशी अपनी कमाई से देते हैं।

तकनीक और आवाज को हथियार बनाकर जीती 'लड़ाई'

निष्क्रिय जिंदगी से लड़ने के लिए जोशी ने तकनीक और अपनी आवाज को हथियार बनाया। उनके कंप्यूटर पर ऐसे साफ्टवेयर और मोबाइल पर ऐसे एप डाउनलोड हैं, जो उनकी आवाज को सुनकर हूबहू टाइप कर देते हैं। जोशी अंग्रेजी पढ़कर हिंदी में बोलते हैं और कंप्यूटर उसे सुनकर आटोमेटिक टाइप करता जाता है। इसी प्रक्रिया से वे हिंदी का अनुवाद अंग्रेजी में करते हैं। दाएं हाथ का अंगूठे में हल्की-सी चेतना है और वह हिल-डुल सकता है। उससे माउस को हिलाने, क्लिक करने सहित आनस्क्रीन कीबोर्ड पर काम करते हैं।

कुर्सी पर बैठे-बैठे ये कमाल करते हैं सुबोध

- अमेरिकी कंपनी अमेजन, भारतीय टेक कंपनी विप्रो, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन सहित 10 राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों व एनजीओ के विशेषज्ञ अनुवादक हैं।

- केंद्र व राज्य सरकार को दिव्यांग संबंधी नीतियां बनाने के लिए सलाह देते हैं।

- अखबारों, पत्रिकाओं में अब तक 250 से अधिक शोध व लेख प्रकाशित हुए हैं।

- दिव्यांगों की सहूलियत के लिए शासन-प्रशासन से वैचारिक लड़ाई लड़ते हैं।

- मप्र हाइकोर्ट में दिव्यांग संबंधी केसेस में न्यायिक तर्क देकर दिव्यांगों का पक्ष रखते हैं।

- राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त संस्थान 'मनोविकास' के नीतिगत सलाहकार रहे हैं।

- स्वयं के पोषण के साथ अपने दो केयर टेकर को रोजगार देते हैं।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay