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फिल्म दंगल सी है हंसा के संघर्ष की कहानी, देपालपुर से हंगरी तक की छलांग, भारतीय कुश्ती टीम में

Updated: | Tue, 22 Jun 2021 10:52 AM (IST)

कपीश दुबे, इंदौर, नईदुनिया।

एक पिता जो खुद सफल पहलवान नहीं बन सका, अपनी बेटी में सपने पूरे होते देखना चाहता है। ग्रामीण माहौल होने से घर में ही अखाड़ा बनाता है। सफलता को लेकर सख्ती ऐसी कि राष्ट्रीय स्पर्धा में बेटी कांस्य पदक जीतने पर भी पिता साथ में फोटो नहीं खिंचाता क्योंकि स्वर्ण से कम मंजूर नहीं। चयन ट्रायल्स में बेटी दिग्गज पहलवान से बड़े अंतर से पिछड़ती है, लेकिन ऐन मौके पर बड़ा दाव मारते हुए बाजी पलट देती है। यह कहानी आमिर खान की फिल्म 'दंगल' की नहीं है। हिंदी सिनेमा की तरह लगने वाली यह वास्तविक कहानी है इंदौर के नजदीक देपालपुर तहसील के अनिल राठौर और उनकी बेटी हंसाबेन की।

दिल्ली में सोमवार को आयोजित राष्ट्रीय चयन ट्रायल्स में 16 साल की हंसा ने सफलता हासिल करते हुए भारतीय टीम में जगह पक्की की। अब हंसा 19 से 25 जुलाई तक बुडापेस्ट (हंगरी) में आयोजित विश्व कैडेट कुश्ती चैंपियनशिप के 57 किग्रा वजन वर्ग में भारत की चुनौती पेश करेंगी। ट्रायल्स में हंसा का सामना राष्ट्रीय चैंपियन हरियाणा की ज्योति से था। हंसा 2-7 अंकों से पीछे थी, लेकिन अंतिम क्षणों में जोरदार दाव लगाते हुए 10-8 से मुकाबला अपने नाम किया। इसके बाद एशियाई चैंपियनशिप की रजत विजेता आरती सरोहा की चुनौती थी, उसे भी आसमान दिखाते हुए हंसा ने भारतीय टीम का टिकट कटाया।

स्वर्ण से कम कुछ मंजूर नहीं : अनिल

पिता अनिल ने बताया कि मैं खुद बड़ा पहलवान नहीं बन सका तो अपने बच्चों को तैयार करने की ठानी। गांव में अपने ही घर में अखाड़ा बनाकर सुविधाएं जुटाई। हंसा सहित गांव की अन्य लड़कियों को प्रोत्साहन मिला तो वे भी आ गईं। अब यहां करीब 10-12 लड़कियां अभ्यास करती हैं और प्रदेश स्तर पर नाम कमा रही हैं। उन्होंने बताया कि बेल्लारी में 19 से 21 मार्च के बीच हुई राष्ट्रीय स्पर्धा में हंसा तीसरे स्थान पर रही थी। मैंने उसके साथ फोटो नहीं खिंचाया क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वह कांस्य से संतुष्ट हो। पिछले साल भी हंसा का ट्रायल्स के लिए चयन हुआ था, लेकिन कोरोना के कारण ट्रायल्स नहीं हुए। अच्छे प्रदर्शन के कारण बेल्लारी के पास जेएसडब्ल्यू में इसका चयन हुआ, जहां इसे बेहतर प्रशिक्षण प्राप्त होता है।

कोरोना के कारण मां को खोया, मगर हिम्मत नहीं हारी

पिछले साल दिसंबर में कोरोना संक्रमण के कारण हंसा की मां अर्चना राठौर का निधन हो गया। छोटी सी बच्ची के मन पर इसका प्रभाव पड़ा, लेकिन पिता ने टूटने नहीं दिया। हंसा भी डटी रही और अभ्यास जारी रखा।

- लंबे समय के बाद मप्र की बेटी ने राष्ट्रीय टीम में स्थान बनाया है। इससे प्रदेश की अन्य लड़कियों को प्रोत्साहन मिलेगा।

-पप्पू यादव (ओलंपियन)

- हंसा बचपन से ही मेहनती है। उसके पिता और मैं साथ में अभ्यास करते थे। पिता अनिल ने बेटी के लिए बहुत त्याग किया है, जिसका फल मिल रहा है।

-कृपाशंकर पटेल (अर्जुन अवार्डी और भारतीय महिला टीम के पूर्व कोच)

Posted By: Sameer Deshpande
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