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Darbar-A-Khas Coloum Indore: संक्रमण से अव्यवस्था या व्यवस्था को संक्रमण

Updated: | Fri, 16 Apr 2021 12:32 PM (IST)

दरबार-ए-खास/ डा. जितेंद्र व्यास Darbar-A-Khas Coloum Indore

कोरोना संक्रमण अब भयावह रूप ले चुका है। अस्पताल से लेकर मुक्तिधामों तक के मंजर डरावने हैं। आक्सीजन, दवाई और बेड की व्यवस्था बुरी तरह चरमराई हुई है। अफरातफरी के बीच रह-रहकर एक ही सवाल सभी की जुबां पर है कि एक साल में भी यदि सामान्य स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं जुटाई जा सकीं तो काहे की व्यवस्था। और तो और करीब दो माह पहले जब महाराष्ट्र में संक्रमण तेजी से बढ़ा उसके बाद भी 'व्यवस्था' की नींद नहीं टूटी। जब जागे तब तक इतनी देर हो चुकी है कि हालात काबू में नहीं आ रहे हैं। व्यवस्था में जुटे अफसरों की सांसें फूलने लगी हैं। मैदान में यदि कुछ नजर आ रहा है तोे वह है अपनों को खोने का करुण क्रंदन और 'सिस्टम' को लेकर गुस्सा। परेशान लोग भी समझ नहीं पा रहे हैं कि यह अव्यवस्था संक्रमण की वजह से है या व्यवस्था ही संक्रमित हो गई है।

दिलासे की राजनीति दौरों तक सिमटी

कोरोना संक्रमण से इंदौर में हालात बिगड़ने पर अफसरों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों को लेकर भी लोगों में नाराजगी है। हर दिन स्थिति बिगड़ रही है लेकिन राजनीतिक दलों के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि बैठक करने और अस्पतालों के दौरे करने से अधिक कुछ नहीं कर रहे हैं। विपक्षी विधायकों ने जरूर पहल कर मेडिकल उपकरण खरीद कर शासकीय अस्पतालों में भेजे हैं, लेकिन जो हालात हैं उसमें यह ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रहे हैं। बीते साल जिस इंदौर का मददगार रूप पूरे देश ने देखा था वहां इस बार इतनी उलट स्थिति भी लोगों को हैरान कर रही है। आक्सीजन सप्लाई का मामला हो या कोविड सेंटर बनाने का, जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी रस्मी ही नजर आ रही है। परेशान लोग अब बोलने लगे हैं कि 'दौरे-दिलासे' की राजनीति से कुछ नहीं होगा लोगों का इलाज करवाओ।

प्लान 'ए' धराशाई, बी तो कागजों पर भी नहीं

कोरोना संक्रमण को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं जताई जाने लगी हैं। डाक्टर फिलहाल एक्टिव केस में कमी होने से इन्कार करने के साथ ही नए मरीजों के लिए सुविधाएं बढ़ाने की बात भी कह रहे हैं। इधर, आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों के संक्रमित होने पर वैकल्पिक इंतजाम कैसे होंगे इसकी फिलहाल योजना ही तैयार नहीं हो सकी है। पुलिस, प्रशासन, मेडिकल, निगम सहित ऐसे कई विभाग हैं जो आवश्यक और नियमित सेवाओं से जुड़े हैं। इनके बीच से यदि ज्यादा कर्मचारी संक्रमित होते हैं तो बी प्लान क्या होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है। फिलहाल न संविदा पर स्वास्थ्य कर्मचारियों की भर्ती की गई है न ही मददगारों को प्रशिक्षण देकर मैदान में उतारे जाने की योजना तैयार हुई है। अस्पताल में मौजूद नर्सिंग स्टाफ और डाक्टर भी थकने लगे हैं। लेकिन फिलहाल राहत की उम्मीद कहीं नजर नहीं आ रही।

'भीड़' के आगे बेबस प्रबंधन...

संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए भले ही कोरोना कर्फ्यू लगाया गया है, लेकिन शहर में स्थिति इससे उलट नजर आती है। किराना, फल और सब्जी की दुकानों को मिली छूट की आड़ में बाजार खुल गए हैं। आवाजाही जितनी नियंत्रित होनी चाहिए वह भी नहीं है। 19 अप्रैल की सुबह जब कोरोना कर्फ्यू की अवधि समाप्त होगी तब भीड़ प्रबंधन कैसे होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है। लाकडाउन से अनिच्छा आपदा प्रबंधन समिति पहले ही जता चुकी है। इसके बाद लोगों की आवाजाही नियंत्रित कर संक्रमण की रफ्तार को रोकने का कोई सर्वमान्य फार्मूला भी अफसरों और जनप्रतिनिधियों के पास नहीं है। ऐसे में यह सवाल बार-बार सामने आ रहा है कि जब अभी ही मरीजों को आक्सीजन और इंजेक्शन नहीं दे पा रहे हैं फिर संक्रमित मरीज ज्यादा सामने आने के बाद व्यवस्थाएं कैसे होंगी? जवाब गहरी चुप्पी में छुपा है... और चुप्पी है कि भोपाल के इशारे के बिना टूटेगी नहीं।

Posted By: Sameer Deshpande
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