World Occupational Therapy Day special Indore: कोरोना काल में बदला बच्चों का बर्ताव, 10 प्रतिशत तक सामने आ रहे मामले

Updated: | Wed, 27 Oct 2021 09:26 AM (IST)

इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि, World Occupational Therapy Day special Indore। कोरोना के दौर में पिछले कुछ माह में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इससे उनके बर्ताव में अंतर नजर आने लगा। बच्चों की समस्याओं का निराकरण करने के लिए अभिभावक अब आक्युपेशनल थेरेपी की मदद ले रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो गुजरे एक साल में करीब 10 प्रतिशत ऐसे मामले सामने आए जिनमें बच्चों का व्यवहार बदला हुआ नजर आया। इसमें चार से लेकर 10 वर्ष तक के बच्चे शामिल हैं।

बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़े बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए अभिभावक आक्युपेशनल थेरेपी इसलिए अपना रहे हैं ताकि दवाओं के बिना भी बच्चों को स्वस्थ रखा जा सके। विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना काल के पहले सामान्य बच्चों को लेकर इस तरह की समस्या बमुश्किल एक या दो प्रतिशत ही थी। अब यह बढ़कर पांच से सात प्रतिशत हो गई है। विशेष व सामान्य दोनों प्रकार के बधाों को मिलाकर आंकड़ा 10 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

50 प्रतिशत समस्या बढ़ी

आक्युपेशनल थेरेपिस्ट डा. पल्लवी बिंदल के अनुसार विगत एक वर्ष में बच्चों के व्यवहार में बदलाव दिखा जिसमें उनका चिढ़चिढ़ा होना, गुस्सा करना, ज्यादा शारीरिक गतिविधि न करना, अधिक भोजन करना, चीखना-चिल्लाना प्रमुख है। ऐसे बच्चों को इस थेरेपी के जरिये बेहतर स्वास्थ्य देने का प्रयास किया जा रहा है। इस थेरेपी को इसलिए अपनाया जा रहा है क्योंकि इसमें दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता। असल में यह थेरेपी बच्चे की ऊर्जा को सही दिशा में लगाने का कार्य करती है। जो पहले से इन समस्याओं से जूझ रहे थे, उनकी समस्या कोरोना काल में 50 प्रतिशत बढ़ी है।

10 साल तक के बच्चे आ रहे दायरे में

आक्युपेशनल थैरेपिस्ट डा. परेश माथुर के अनुसार वर्तमान में चार से 10 साल तक के बच्चों में यह समस्या दिख रही है। कोरोना काल के पहले सामान्य बच्चों के बर्ताव में आने वाले बदलाव के मामले कुछ ही प्रतिशत आते थे लेकिन अब यह आंकड़ा करीब 10 प्रतिशत तक पहुंच गया है। अभी भी एक वर्ग ऐसा है जो इस बात को स्वीकार नहीं करता कि बच्चे की इन समस्याओं के निदान के लिए विशेषज्ञ की मदद ली जाए। शारीरिक श्रम नहीं करना, सामाजिक नहीं हो पाना, आनलाइन कक्षाओं का बोझ, ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं कर पाने और टीवी-मोबाइल पर अधिक व्यस्त रहने के कारण यह समस्या बढ़ रही है।

केस 1: चार वर्षीय बच्चा शारीरिक समस्या के चलते चल नहीं पाता था। उसे आक्युपेशनल थेरेपी देकर चलना सिखाने में करीब ढाई वर्ष लगे। कोरोना महामारी के दौर में उसे थेरेपी के लिए विशेषज्ञ के पास नहीं लाया गया और न ही परिवार ने घर पर उसे व्यायाम करवाया। परिणामस्वरूप उसे चलने में दोबारा समस्या आने लगी।

केस 2: सात वर्षीय बच्चा पिछले कुछ माह से अकेले में बात करता है। असल में उसने एक आभासी आकृति अपने आसपास बना ली। वह एकांत पसंद करने लगा। इसकी वजह घर में ही रहना, मोबाइल व टीवी ज्यादा देखना और सामाजिक होने से कतराना है।

Posted By: gajendra.nagar