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Jabalpur News: गीतांजलि के सर्वोत्कृष्ट अनुगायक जबलपुर के भवानी प्रसाद तिवारी

Updated: | Thu, 03 Dec 2020 12:31 PM (IST)

सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। एक-दो नहीं पूरे सात बार जबलपुर के प्रथम नागरिक अर्थात महापौर निर्वाचित हुये पंडित भवानी प्रसाद तिवारी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की नोबल पुरस्कृत कृति 'गीतांजलि' का सर्वोत्कृष्ट अनुगायन किया था। उन्होंने 1942 में भारत छोडो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में जेल में बंद रहते हुए हरि विष्णु कामथ की प्रेरणा से यह प्रशंसनीय सृजन किया था। इसका प्रकाशन होने पर स्वयं टैगोर के अलावा अनेक समकालीन रचनाकारों ने इस कृति की मुक्तकंठ से सराहना की थी। इसी के साथ जबलपुर के श्री तिवारी की ख्याति देशभर में फैल गई। खास बात यह कि 'सौंदर्य की नदी नर्मदा' के रचयिता जबलपुर निवासी अमृतलाल वेगड सहित जबलपुर के कुछ अन्य नामवर कलाकार गुरुदेव के शांतिनिकेतन के विद्यार्थी रहे। पंडित भवानी प्रसाद तिवारी की पुत्रवधू अनामिका तिवारी के अनुसार मेरे बाबूजी ने टैगोर की अंग्रेजी गीतांजलि से भाव ग्रहण करके हिंदी गीतांजलि की रचना की थी। इसीलिये उसे महज अनुवाद के स्थान पर अनुगायन की कोटि में समादृत किया गया।

गीत जब जैसा उठा, वैसा अंकित किया गया : स्वयं भवानी प्रसाद तिवारी ने अपनी कृति के प्रारंभ में स्पष्ट किया है कि मैं सर्वप्रथम गीतांजलि के भाव से जुड़ा, इसके बाद गीत जब जैसा उठा, वैसा अंकित किया गया। बहरहाल, मैं सहजता से गीत गा सकने के हुनर में कहां तक सफल रहा, वर्तमान और भविष्य के गीत पारखी बखूबी यह निर्धारित कर सकेंगे।

गीतांजलि के अनुरूप अनुक्रम और भावगत समानता : सबसे खास बात यह है कि जबलपुर के श्री तिवारी की समूची कृति में गुरुदेव की मूल गीतांजलि के अनुरूप भरपूर अनुक्रम भी है और भावगत समानता भी। यह साहित्यिक समझ की दृष्टि से अपने आप में किसी कमाल से कम नहीं। जब यह रचना गुरुदेव के समक्ष पहुंची, तो उन्होंने इसे अपनी गीतांजलि का अनुवाद मात्र न मानकर सर्वथा मौलिक कृति निरूपित करते हुये हौसला बढ़ाया।

प्रत्येक पृष्ठ में गुरुदेव का रेखाचित्र, उसके ऊपर गीत : भारत प्रकाशन, सुषमा साहित्य मंदिर के अलावा एक अन्य प्रकाशन से यह कृति तीन संस्करणों में समय-समय पर सामने आई। इसके प्रत्येक पृष्ठ पर गुरुदेव का रेखाचित्र अंकित था, जिसके साथ एक-एक गीत की प्रस्तुति दी गई। इस तरह सुधिपाठकों के बीच यह कृति बेहद लोकप्रिय हुई। इसने संस्कारधानी जबलपुर और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बीच रचनात्मक संबंध की डोर को मजबूत किया था। जबलपुर के व्याकरणिक कामता प्रसाद गुरु की तरह भवानी तिवारी भी राष्ट्र के गौरव हो गए थे।

Posted By: Ravindra Suhane
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