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Black Fungus Attack: वातावरण में मौजूद हैं फंगस, आंखों से मस्तिष्क तक पहुंची तो खतरे में जान

Updated: | Sat, 15 May 2021 09:00 AM (IST)

जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। ब्लैक फंगस संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। आसपास के कई जिलों के मरीज भी ब्लैक फंगस का इलाज कराने के लिए जबलपुर पहुंच रहे हैं। जबलपुर हॉस्पिटल में ऐसे दो मरीजों का ऑपरेशन कर उनकी जान बचाई गई। बीते 10 दिन में अस्पताल में ब्लैक फंगस के तमाम मरीज उपचार कराने पहुंचे। पांच मरीज स्वस्थ होकर जा चुके हैं। 14 मरीज भर्ती हैं जिनमें से सात का ऑपरेशन किया जा चुका है। अन्य सात मरीजों के ऑपरेशन की तैयारी की जा रही है। अस्पताल के डायरेक्टर मक्सिलोफेसियल सर्जन डॉ. राजेश धीरावाणी ने बताया कि फंगस आंखों तक पहुंच जाए तो उनकी ज्योति के लिए खतरा बन सकता है। यदि मस्तिष्क तक पहुंच जाए तो मरीज की जान बचाना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने बताया कि कोरोना के ऐसे मरीज जिन्हें डायबिटीज या अन्य बीमारियां हैं, अंग प्रत्यारोपण हो चुका है उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण ब्लैक फंगस के संक्रमण की आशंका बनने लगी है जिसे म्यूकर माइकोसिस कहा जाता है।

सड़ने लगती है हड्डी, आंख, जबड़ा निकालना जरूरी: डॉ. धीरावाणी ने बताया कि म्यूकर माइकोसिस के कारण संक्रमित अंग की हडि्डयों में सड़न होने लगती है। लिहाजा संक्रमित हड्डी, आंख, जबड़ा, तालू आदि को ऑपरेशन कर निकाला जरूरी हो जाता है। दो मरीजों की आंख निकालनी पड़ी। ज्यादा संक्रमण की दशा में ऐसे ऑपरेशन करने पड़ रहे हैं। मरीज यदि समय पर अस्पताल पहुंच जाए तो उसे ऑपरेशन के बगैर ठीक किया जा सकता है। इस बीमारी का खतरा किस कदर बढ़ा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रोजाना 2-3 नए मरीज ब्लैक फंगस का इलाज कराने भर्ती हो रहे हैं। हालांकि संक्रमण की शुरुआत में ही उपचार प्रारंभ कर देने से संक्रमण के गंभीर जोखिम से बचा जा सकता है।

वातावरण व गोबर में रहते हैं कण: जबलपुर हॉस्पिटल की माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. अनीशा पाल ने बताया कि कल्चर व बायोप्सी रिपोर्ट पता चलता है कि म्यूकर माइसोसिस एस्परजिलोसिस, केंडिडा ग्लेब्रेंटा नामक फंगस का संक्रमण ज्यादा हो रहा है। फंगस के कण वातावरण में, गोबर व गंदगी में पाए जाते हैं। डायबिटीज, क्षय रोग, अंग प्रत्यारोपण के मरीजों में ज्यादा संक्रमण हो रहा है। कोविड इलाज के दौरान स्टेरायड, हाईफ्लो ऑक्सीजन की आवश्यकता वाले मरीजों में भी संक्रमण देखा जा रहा है। उन्होंने बताया कि जिस पाइप के माध्यम से मरीज को ऑक्सीजन दी जाती है उसमें अनिवार्य रूप से डिस्टिल वॉटर का उपयोग किया जाए। गलत तरीके से चिकित्सा व्यवसाय कर रहे लोग मरीजों को स्टेरायड के इंजेक्शन व टैबलेट दे रहे हैं जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ गया है।

चिकित्सकों की टीम बनाई: जबलपुर हॉस्पिटल के डायरेक्टर धीरावाणी ने बताया कि ब्लैक फंगस संक्रमित मरीजों के उपचार व ऑपरेशन के लिए चिकित्सकों की टीम गठित की गई है। टीम में उनके अलावा मेक्सिलोफेसियल सर्जन डॉ. अंकित शर्मा, ईएनटी सर्जन डॉ. अनिरुद्ध शुक्ला, नेत्र विशेषज्ञ डॉ. मुकेश खत्री, भेषज विशेषज्ञ डॉ. दीपक बहरानी व डॉ. परिमल स्वामी, किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतीक्षा पिपलेवार, निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ. अमरजीत गुजराल, क्रिटिकल केयर के डॉ. राजन राय, डॉ. राजीव दुग्गल, डॉ. दीप माला, डॉ. शिवहरे शामिल हैंं।

Posted By: Ravindra Suhane
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