jabalpur khabaron ke peechhe Column: शुरू से रहे दीवारों के कान

Updated: | Sun, 25 Jul 2021 06:30 AM (IST)

कॉलम-खबरों के पीछे- देवशंकर अवस्थी, नईदुनिया जबलपुर। दीवारों के कान वाली कहावत यूं ही नहीं बनी। कोई सुन न ले.. अर्थात जासूसी पहले भी होती रही। यह बात अलग है कि उसमें चेहरे बदल जाते थे। इसमें परिवार, पड़ोस, दोस्त-दुश्मन या और कोई भी हो सकता है। रामायण और महाभारत काल में भी जासूसी होती रही। रावण ने सुक और सारण नामक दो जासूस विभीषण के पीछे भेजे थे। राजा-महाराजा भी जासूसों की भरपूर मदद लेते रहे। दुश्मन की तो ठीक, दोस्त राजाओं की भी जासूसी होती रही, ताकि यह पता चल सके कि मुसीबत पर वह कितना काम आएगा। इस समय जासूसी को लेकर उबाल आया है। जासूसी हुई अथवा नहीं हमें इस पचड़े में नहीं पड़ना। यह जरूर कहेंगे कि जासूसी शासनतंत्र का अहम हिस्सा रहा है। देश में जासूसी को लेकर पहले भी कई बार हल्ला मचा है। यानी जब तक दीवारें रहेंगी तो उनके कान भी रहेंगे।

चुनाव कराने हैं तो तीसरी लहर रोको

जबलपुर के प्रभारी मंत्री गोपाल भार्गव ने कहा कि तीसरी लहर नहीं आई तो निकाय चुनाव जल्द होंगे। आशय स्पष्ट है कि चुनाव, तीसरी लहर पर निर्भर हैं। चुनाव का दारोमदार अब नेता और मतदाताओं पर है। दूसरी लहर कमजोर पड़ने के साथ चुनाव के दावेदारों ने मतदाताओं के बीच जाना शुरू कर दिया। लोगों की समस्याओं पर भी ध्यान देने लगे। रही बात मतदाताओं की तो वे तीसरी लहर को खुलकर आमंत्रण दे रहे हैं। बाजार व सड़कों की भीड़ देखकर यही लगता है, मानो लोग कोरोना के दंश को पूरी तरह भुला चुके हैं। थोड़ा बहुत मास्क ही बिक रहे, अन्यथा सैनिटाइजर की बिक्री तो नाम की रह गई। अब देखना यह कि तीसरी लहर आती है या चुनाव होते हैं। बहरहाल, मतदाताओं के बीच जा रहे दावेदारों को चाहिए कि लोगों से कोरोना से सावधान रहने की विनती करते रहें।

महामारी में धोखा देने वालों का क्या

कोरोना महामारी के दौरान कर्तव्यनिष्ठ लोगों की सेवाओं को जनता कभी भुला नहीं पाएगी। विशेषकर स्वास्थ्य अमले में ऐसे सैकड़ों लोग रहे, जिन्होंने अपने प्राणों की चिंता किए बिना मरीजों की सेवा की। वे महीनों से घर नहीं गए, बच्चों का मुंह नहीं देखा, खुद बीमार पड़े लेकिन मरीजों की सेवा में लगे रहे। सचमुच में ऐसे लोगों से ही समाज का ताना-बाना सुरक्षित बना हुआ है। अन्यथा ऐसे चेहरों को भी लोग जान चुके हैं, जिन्होंने दुख के मारों को लूटने में तनिक भी संकोच नहीं किया। लोग मरते रहे और कुछ लुटेरे इलाज के नाम पर लूटते रहे। कोरोना काल में लोगों ने मुसीबत में अपने और परायों को निकट से देखा। इस समय कोरोना योद्धाओं का जगह-जगह सम्मान हो रहा है। लोगों को चाहिए कि वे ऐसे चेहरों की पहचान करके रखें कि मुसीबत में कौन उनका सच्चा साथी है।

कब तक बहते रहेंगे नदी-नालों में

हमारे देश में लगता है बारिशकाल में लोगों का नदी-नालों में बहना बंद नहीं होगा। बरसात के दिनों में नदी-नालों में लोगों के बहने की खबरें आम हो जाती हैं। अधिकतर हादसे रपटा अथवा पुलों को पार करने में होते हैं। पुलों में पानी होने पर दोपहिया और चार पहिया वाहनों को निकालना हमारे यहां बहादुरी का प्रतीक माना जाता है। बसों में सवारी बैठी रहती है और पुल में पानी होने पर तनिक भी परवाह नहीं की जाती। कुछ मछली मारने, पिकनिक मनाने के फेर में बह जाते हैं। पहले ऐसा होता तब भी चल जाता, अब तो इंटरनेट मीडिया में ऐसे हादसों के अनगिनत वीडियो भी आते रहते हैं, फिरभी लोग सावधानी नहीं बरतते। लोगों को यह जान लेना चाहिए कि मात्र छह इंच पानी का बहाव भी आपको या वाहन को बहा सकता है। पता नहीं कब थम पाएंगे ऐसे हादसे।

Posted By: Brajesh Shukla