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Jabalpur News: हाई कोर्ट ने कहा- प्रदेश के पेट्रोल पंपों में पीयूसी सेंटर अनिवार्य

Updated: | Thu, 28 Jan 2021 07:34 PM (IST)

जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि प्रदूषण स्तर नियंत्रित रखने के मद्देनजर राज्य के प्रत्येक पेट्रोल पंप में पीयूसी सेंटर अनिवार्य है। लिहाजा, राज्य शासन द्वारा सभी फ्यूल स्टेशन यानी पेट्रोल-डीजल व गैस पंप में पीयूसी सेंटर अनिवार्य किए जाने का आदेश उचित है। लाखों वाहनों से उत्सर्जित होने वाले प्रदूषण के कारक धुएं का स्तर कम करने की मंशा से यह व्यवस्था दी गई है। ऐसे में इसका विरोध अनुचित है। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले पर गौर करने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि पीयूसी सेंटर की अनिवार्यता वाले आदेश में कोई खामी नहीं है। इसलिए जनहित याचिका खारिज की जाती है।

पेट्रोल-डीजल पंप संचालकों ने दायर की थी जनहित याचिका : छिंदवाड़ा निवासी अनिल देशमुख, जयेश धनजी भाई शाह, मनोज पात्रीकर सहित कुल 25 पेट्रोल-डीजल पंप संचालकों की ओर से यह जनहित याचिका दायर की गई थी। अधिवक्ता जयदीप सिरपुरकर ने कोर्ट को बताया कि 29 अगस्त 2017 को केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के लिए एक एडवाइजरी जारी की। इसके परिप्रेक्ष्य में राज्य के परिवहन आयुक्त (ग्वालियर) ने 15 अक्टूबर 2020 को प्रदेश के सभी क्षेत्रीय-जिला परिवहन अधिकारियों को आदेश जारी किए कि सभी फ्यूल स्टेशनों में पीयूसी सेंटर अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाएं। इसी संदर्भ में छिंदवाड़ा कलेक्टर ने पांच नबंबर, 2020 को याचिकाकर्ताओं में से एक पेट्रोल पंप संचालक को उनके पंप में पीयूसी सेंटर स्थापित करने के निर्देश दिए। दलील दी गई कि विशेषज्ञ संस्था पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम व नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने पीयूसी सेंटर्स की अधिकता को देखते हुए इनकी संख्या सीमित करने की अनुशंसा की है। ऐसे में हर फ्यूल स्टेशन में पीयूसी सेंटर अनिवार्य करने का आदेश उक्त अनुशंसा के विपरीत है। इस तरह का आदेश संविधान के अनुच्छेद 19-जी में वर्णित व्यापार के मौलिक अधिकार का भी हनन है। लिहाजा, उक्त आदेश को निरस्त किया जाए। राज्य व केंद्र सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि फ्यूल स्टेशनों में पीयूसी सेंटर होने से पीयूसी परीक्षण की विश्वसनीयता बढ़ेगी। साथ ही इन सेंटर्स को एक जवाबदेह ढांचे के तहत लाया जा सकेगा। इसलिए याचिका सारहीन है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने इन तर्कों से सहमत होकर जनहित याचिका खारिज कर दी। राज्य सरकार का पक्ष उपमहाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली ने रखा।

Posted By: Brajesh Shukla
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