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Rani Durgavati Sacrifice Day: रानी दुर्गावती ने अपने 16 वर्षीय शासनकाल में 12 हजार गांवों पर किया सीधा शासन

Updated: | Thu, 24 Jun 2021 11:20 AM (IST)

अनुकृति श्रीवास्‍तव, जबलपुर। Rani Durgavati Sacrifice Day। वीरांगना रानी दुर्गावती नारी सशक्तिकरण का आदर्श हैं। जो 24 जून, 1564 में मुगलों से अपने अंतिम युद्ध में वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं थीं। यह युद्ध जबलपुर शहर की सीमा से करीब 24 किलोमीटर दूर बरेला रोड पर मौजूद नर्रई नाला पर हुआ था। 23 जून, 1564 को रानी की यहां आसफ खां से पहली मुठभेड़ हुई थी। जहां रानी व उसके साथियों ने मुगलों का बहादुरी से सामना किया। रानी के एक छोटे सामंत वदन सिंह के मुगलों के साथ मिल जाने के कारण 24 जून को रानी को वीरगति मिली। वीरांगना रानी दुर्गावती की शौर्य गाथा को लेकर अभी तक इतिहास में तीन युद्धां का वर्णन है। जिसमें अंतिम युद्ध 24, 1564 का है।

इतिहासविद डॉ. आनंद सिंह राणा ने बताया कि उन्होंने इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत के अंतर्गत चंदेलों की बेटी और गोंडवाना की रानी व गोंडवाना के इतिहास पर पिछले तीन वर्षों में काफी अनुसंधान किया है। डॉ. राणा ने बताया कि रानी ने अपने 16 वर्ष के शासनकाल में पूरे राज्य में एक समान कर व्यवस्था लागू की थी। जहां कर सोने के सिक्के व हाथियों से चुकाया जाता था। रानी ने 12 हजार गांवों पर सीधा शासन किया। उम्दा जल प्रबंधन के लिए रानी का शासनकाल इतिहास में हमेशा उल्लेखनीय रहेगा।

रानी का जन्म पांच अक्टूबर, 1524 को उत्तरप्रदेश के बांदा जिले में कालिंजर के राजा कीरत सिंह चंदेल के यहां हुआ था। वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण नाम दुर्गावती रखा गया था। रानी का विवाह गोंडशासक दलपत शाह से हुआ। राजा दलपतशाह का निधन 1548 में हो गया। उसके बाद रानी ने शासन किया। रानी ने पहला युद्ध 1555 से 1560 के बीच पहला युद्ध मांडू के शासक बाज बहादुर से किया। इसके बाद अकबर ने रानी को कमजोर समझते हुए आत्मसमर्पण की बात की। रानी के न मानने पर सिंगौरगढ़ का युद्ध हुआ। जहां रानी ने तीन युद्ध लड़े।

तीसरे युद्ध में रानी के हाथ से सिंगौरगढ़ निकल गया। इसके बाद रानी ने चंडालभाटा का युद्ध किया। गौर नदी पर भी युद्ध हुआ। और फिर अंतिम युद्ध नर्रई नाला का रहा। इसके पहले रानी ने अपने पिता कीरत सिंह चंदेल के साथ ही हनुमान द्वार, गणेश द्वार, लाल दरवाजा का युद्ध, बुद्धभद्र दरवाजे का युद्ध भी लड़ा। रानी इतनी वीर थी कि दोनों हाथों से तीन तलवार चलाती थी। व्यूह रचना में उनका कोई मुकाबला नहीं थी। जिसमें अर्धचंद्र व क्रौंच व्यूह प्रमुख हैं।

महिला सशक्तिकरण को दिया बढ़ावा: रानी दुर्गावती ने महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया। वे खुद भी इसका साक्षात उदाहरण थीं। उन्होंने अपनी सेना में महिला टुकड़ी को शामिल किया था। इस टुकड़ी ने रानी के साथ युद्ध में अपना कौशल दिखाया। महिलाओं को शिक्षित करने का प्रयास किया। साथ ही महिलाओं को कुटीर उद्योग जैसे लाख के उद्योग से जोड़ कर आर्थिक रूप से मजबूती भी दी।

Posted By: Ravindra Suhane
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