नगर सरकार कॉलम: पैसे मिले तो मोर को भी कौआ बना दें

Updated: | Mon, 02 Aug 2021 04:06 PM (IST)

कॉलम - नगर सरकार- सुनील दाहिया, नईदुनिया जबलपुर। लाल बिल्डिंग में एक से बढ़कर एक कलाकार हैं। ये रिश्वतखोरी की कला में भी माहिर हो चुके हैं। यदि मुंहमांगे पैसे मिले तो मोर को भी कौआ बना दें तो फिर मकानों के नक्शा में फेरबदल, सेटलमेंट कर कब्जेदार के मुताबिक कब्जा तोड़ना इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं। यहां बड़े से लेकर छोटे कर्मचारी भी इसमें पीछे नहीं रहे। यहां तक कि ठेके पर रखे कर्मी भी खुलेआम रिश्वत लेने लगे हैं। हालांकि गाहे-बगाहे इनकी ये कला कभी-कभार खाकी के हत्थे चढ़ जाती है। जैसे पिछले दिनों हुआ। लाल बिल्डिंग के एक कर्मी को सेटलमेंट कर कब्जा हटाने के एवज पर ली गई रकम के साथ लोकायुक्त की टीम ने धरदबोचा। बाद में पता चला ये तो एक अदना से ठेकाकर्मी है। अब ये किन अधिकारियों की शह पर निडरता के साथ खुलेआम रिश्वत मांग रहा था उनकी पड़ताल की जानी चाहिए।

गजब है लाल बिल्डिंग की माया :

लाल बिल्डिंग की ऐसी माया है कि एक बार जो यहां जम गया तो फिर दोबारा यहां से जाने की सोचता भी नहीं। अब सब इंजीनियर को ही देख लें। लंबे समय से मलाईदार विभाग में जमे ये अधिकारी तबादला होने के चार माह बाद भी यहीं डटे हुए हैं। लाल बिल्डिंग के अफसर भी उन्हें रिलीव करने के बजाय शासन से जारी तबादला आदेश ही दबा गए। मुखिया, प्रशासक ने भी सरकारी आदेश पर न संज्ञान लिया न एक्शन। हुआ ये कि माया के मोह में आकंठ तक जकड़े अधिकारी को यहां से रुखस्त करने के लिए भोपाल में बैठे अफसरों को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस ताकीद के साथ कि यदि अब भी ये यहां से नहीं टरे तो तत्काल उन्हें निलंबित कर दिया जाए। जानकार कहते हैं ये लाल बिल्डिंग है जनाब जो आया तो बस यहीं का होकर रह गया।

ओहदा बड़ा या उम्र :

ओहदा बड़ा या उम्र। इसे लेकर लाल बिल्डिंग में बहस के साथ मतभेद भी उभरने लगे हैं। दरअसल, एक अधिकारी को जिस विभाग की कमान सौंपी गई है वहां पहले से विभाग के जानकार और उम्र में बड़े अधिकारी तैनात हैं। उन्हें उस विभाग का अच्छा खासा तर्जुबा भी हासिल है। अब उनके ऊपर उम्र में छोटी लेकिन ओहदे में बड़ी अधिकारी को बैठा दिया गया है। अब जो भी फाइलें बनेंगी वह उनकी टेबल से होकर ही गुजरेंगी। लिहाजा विभागीय अधिकारी इससे सहमत नहीं दिख रहे। हालांकि वे उम्र और ओहदे के बीच आपसी सामंजस्‍य बैठाने की भरपूर कोशिश भरपूर कर रहे हैं। फिर भी उनका ईगो सामने आ रहा है। बहरहाल मनमसोस कर अधिकारी का हुक्म बजाने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। अधिकारी भी उम्र में छोटी जरूर हैं लेकिन ओहदे में बड़ी और काम में काफी तेज भी हैं।

अवार्ड की आंकड़ेबाजी तो नहीं :

स्मार्ट सिटी जबलपुर को एक के बाद एक राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार से नवाजा जा रहा है। पहले हेरीटेज सिटी अवार्ड फिर एनर्जी एफिशिएंसी प्रोजेक्ट फिर बेस्ट परफार्मिंग सिटी अवार्ड और अब साइकिल फॉर चेंज अभियान में स्पेशल ज्यूरी अवार्ड दिया गया है। शहर के लिए ये बड़े फर्क की बात की है। लेकिन शहर में रहने वाले जानकार इन अवार्डों को पचा नहीं पा रहे हैं। उनका कहना है कि साइकिल फॉर चेंज के नाम पर हर संडे अधिकारी और स्टॉफ द्वारा डुमना नेचर तक साइकिलिंग कर सैर करने मात्र से स्पेशल ज्यूरी का अवार्ड समझ से परे है। क्योंकि शहर में साइकिल कहीं भी दिख नहीं रही हैं। वाहनों की संख्या इतनी बढ़ गई कि पार्किंग के लिए जगह तक नहीं रह गई है। स्मार्ट सिटी से हो रहे काम पांच साल बाद भी अधूरे पड़े हैं तो अवार्ड मिल कैसे रहे हैं?

Posted By: Brajesh Shukla