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Jabalpur News: भारत के प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट के वैज्ञानिक जबलपुर में शिव मंत्रोच्चार से कर रहे उपचार

Updated: | Wed, 02 Dec 2020 11:44 AM (IST)

सुरेन्द्र दुबे, जबलपुर। भारत के प्रथम उपग्रह 'आर्यभट्ट' की आविष्कारक-टीम के डिप्टी डायरेक्टर प्रिंसिपल टेक्निकल ऑफिसर के रूप में साल 1971 से 1975 के बीच अहम योगदान देने वाले जबलपुर निवासी साइंटिस्ट डॉ.शिव प्रसाद कोष्टा ने 'शिव-मंत्रोच्चार' के जरिए रोगियों का उपचार करने का अनूठा प्रयोग किया है। इसके लिए उन्होंने शहर के देवताल क्षेत्र की मनोरम उपत्यका में अद्भुत 'शिवालय' का निर्माण किया है। जिस पर सूर्य की पहली और अंतिम किरण अठखेली करती है।

जबलपुर के उपनगर गढ़ा की शासकीय स्कूल और राबर्टसन कॉलेज से पढ़कर निकले मेधावी छात्र डॉ.शिव प्रसाद कोष्टा इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) में 1981 से 1987 के बीच ग्रुप डायरेक्टर और 1987 से 1990 के बीच समीर डिपार्टमेंट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नालॉजी, गर्वन्मेंट ऑफ इंडिया में डायरेक्टर के अलावा 1990 से 1994 के बीच रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं। 1965 से लेकर अब तक इलेक्ट्रॉनिक साइंस विषय पर केन्द्रित 150 से अधिक रिसर्च पेपर भी देश-विदेश के रिसर्च जनरल्स में प्रकाशित हो चुके हैं।

तरंगे (वेव्स) द्रव्य (मैटेरियल) में परिवर्तित हो जाती हैं, यही इलाज का मूल आधार : उन्होंने विमर्श के दौरान बताया कि पूर्व स्थापित वैज्ञानिक सिद्धांत है कि तरंगे (वेव्स) द्रव्य (मैटेरियल) में परिवर्तित हो जाती हैं। दरअसल, यही मूलभूत वैज्ञानिक सिद्यांत शिव-मंत्रोच्चार से इलाज का आधार है। यहां शिवालय में मंत्रोच्चार भरपूर भावना के साथ होता है, जो रोगी सुनता है और उसके मानस-पटल पर वाईब्रेशन होती हैं, यहीं तरंगें विज्ञान के अनुरूप 'दवा' का कार्य करती हैं, और 'आंतरिक रसायन' सक्रिय होकर 'रोगप्रतिरोधक क्षमता' का परिवर्धन कर रोगोपचार के कारक बनते हैं। इसके अतिरिक्त रोगी के साथ फूल-राख व स्नेहिल-स्पर्श के प्रयोग भी होते हैं। वस्तुत: भारतीय संस्कृति में वर्णित अक्षर-शब्द ही ब्रह्म है, यह भाव विज्ञान से मिलकर इलाज का सबब बनता है। आयुर्वेद के 'ऋषि च्यवन' की 'कायाकल्प विधि' का भी यहां प्रयोग होता है। इसके लिए गुफा में द्वादश अधिकृत मंत्रोच्चारक विधान संपन्न करते हैं।

धर्म-अध्यात्म और दर्शन की आधुनिक विज्ञान से युति : भौतिक विज्ञान जहां से सोचना बंद करता है, मेटाफिजिक्स वहीं से नए वैज्ञानिक तथ्यों का आविष्कार-अनावरण-उद्धाटन कर देती है। धर्म-अध्यात्म और दर्शन की इसी युति के साथ आधुनिक विज्ञान का समावेश करके मेडिकल साइंस-आयुर्वेद के समकक्ष नवाचारपूर्ण प्रयोग किया गया है। जिनका स्रोत लोकार्थ अध्यात्म विज्ञान अनुसंधान समिति (लावास) है।

विश्व का सबसे अनूठा शिवालय: शिव ही सत्य हैं, सत्य ही सुंदर है। इस सूत्र को जीवन-व्यवहार में उतारकर संस्कारधानी जबलपुर की लघुकाशी गढ़ा के देवताल में विश्व का सबसे अनूठा शिवालय निर्मित कराया गया। त्रिगर्भ कुटि निर्माण के स्वप्न को साकार करने की मंशा के साथ 1996 में इसकी नींव रखी गई थी। भीतर तांबे का 6 फिट का शिवलिंग स्थापित है, जिसे भारत से अमेरिका सहित संपूर्ण विश्वयात्रा कराने के बाद प्राणप्रतिष्ठित किया गया। सबसे नीचे द्वादश ज्योर्तिलिंग उसके बाद एकादश रुद्र, नौ देवियां, एक हजार शिवलिंग और शिखर पर अर्द्धनारीश्वर विराजमान हैं।

पूर्व राष्ट्रपति कलाम, टीएन शेषन सहित अन्य ने की विजिट: यहां पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन के अलावा रावतपुरा सरकार भी विजिट कर चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी खिंचे चले आए थे। शहर की प्रथम नागरिक महापौर डॉ. स्वाति सदानंद गोडबोले को भी शिव ने बुलाया। कई देशी-विदेशी जिज्ञासावश चले आते हैं। इस तरह जबलपुर का यह वैज्ञानिक तीर्थ चर्चित हो गया है।

Posted By: Ravindra Suhane
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