Teesaree Aankh Column : गड्ढों में सड़क, स्मार्ट सिटी की तलाश

Updated: | Fri, 24 Sep 2021 08:50 AM (IST)

कालम - तीसरी आंख - राजीव उपाध्याय, जबलपुर, नईदुनिया। शहर का ऐसा विकास कि सड़कें ही गायब हैं। ऐसा फ्लाईओवर बन रहा है कि आसपास की सड़क को गड्ढों में तलाश करना पड़ता है। आम जनता को तो अब यह सोचना पड़ता है कि किस रास्ते से जाएं कि सड़क मिल जाए। शहर के कुछ गड्ढे तो मोहल्ले की पहचान बन गए हैं लोग यह बताने लगे हैं कि फलां जगह एक बड़ा गड्ढा मिलेगा वहां से बाएं मुड़ जाना। यह तो बड़ी विकट स्थिति है। इसके बाद भी जब यह महसूस कराया जाता है कि गर्व करें कि आप स्मार्ट सिटी में हैं तो नजर चारों ओर घूम ही जाती है। स्मार्ट सिटी तो बस सपने में ही आती है। आम जनता तो खुली आंख से यह देखने का प्रयास करती है कि स्मार्ट सिटी किस ओर दिखाई दे रही है जरा उसे भी देख लिया जाए कि कैसी दिखती है।

अंगद का पांव है, हिलेगा नहीं :

राजनीति में भी अंगद के पांव होते हैं। इसे हिलाने की कोशिश की जाती है लेकिन कोशिश बेकार जाती है। अब हमारे शहर के कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश यादव ने तो ऐसा पांव जमाया कि किसी की हिम्मत नहीं कि हिला सके। कौन कहता है कि संगठन में शहर अध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल का होता है। भैया के तो एक दशक से अधिक हो गए। उनका पांव हिलाने वाले खुद हिल गए लेकिन उनका जमा हुआ पांव न हिला सके। कांग्रेस में नियम तो बनते हैं लेकिन वे बस चर्चा के लिए रहते हैं। वैसे भी जो उनका पांव हिलाने की कोशिश कर रहे थे समझ चुके हैं कि प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ खुद ही नहीं चाहते कि शहर अध्यक्ष के मजबूत पांव को कोई हिलाए। अब जिनको अध्यक्ष बनना है तो वे दूसरे पदों की तलाश में है कि कुछ तो मिल जाए।

दिल में समाया कोरोना का खौफ :

कोरोना का खौफ कायम है। नौनिहालों के स्कूल खोले गए तो एक अभिभावक ने स्कूल की दीवार पर कोरोना के खौफ का जिक्र करते हुए पत्र चस्पा कर दिया। वैसे कोरोना से डरकर बच्चों का भविष्य तो दांव पर नहीं लगाया जा सकता लेकिन यह भी सत्य है कि बच्चों को संक्रमण न हो इसके लिए भी व्यवस्था हो। शहर के कुछ सरकारी स्कूलों के भवन जर्जर हो चुके हैं। कोरोना से भय तो सता ही रहा है, जर्जर भवनों का भय भी अभिभावकों को है। वहां किस तरह से बच्चों को बैठाएंगे। अधिकारियों ने यह नहीं सोचा कि कोरोनाकाल के बाद जब स्कूल खुलेंगे तो इनकी मरम्मत करा दी जाए। सरकारी ढर्रा है, ऐसा ही चलता है। शायद यह अधिकारियों की समझ में यह नहीं आया कि बच्चों को कोरोना से बचाव के साथ जर्जर भवन से भी तो सुरक्षित करना जरूरी है।

ऐसे भी सेवादार, खून देने हमेशा तैयार :

इंसानियत अभी बाकी है। ऐसे भी सेवादार हैं जो खून की जरूरत पड़ने पर रक्तदान करने आधी रात को भी तैयार हैं। डेंगू महामारी में मरीजों को प्लेटलेट्स की कमी होने पर सबसे मुश्किल काम ब्लड बैंक से प्लेटलेट्स लाना है। इस वक्त तो प्लेटलेट्स यदि किसी मरीज के स्वजन को मिल गई तो उसने जग जीत लिया। यह हमारी स्वास्थ्य और प्रशासनिक अव्यवस्था का नतीजा है। ऐसे में कुछ लोग जब खून देने तैयार रहते हैं तो वे किसी भगवान से कम नहीं। शहर में ऐसे युवा यह परोपकार बिना किसी आर्थिक लालच के कर रहे हैं। उनकी इस मदद से कई ऐसे मरीजों की जान बच गई जिनके स्वजन खून के एक यूनिट के लिए भटक रहे थे। ऐसे ही परोपकारी युवाओं से बेहतर और सभ्य समाज का निर्माण होता है जोकि बिना किसी लालच के अपना काम कर रहे हैं।

Posted By: Brajesh Shukla