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वक्रदृष्टि : छोड़ो धंधे तमाम, उगाओ आम

Updated: | Tue, 22 Jun 2021 07:25 AM (IST)

कॉलम-वक्रदृष्टि-डॉ. प्रमोद पांडेय

आम फलों का राजा होता है। आम के आम गुठलियों के भी दाम। इसके बाद अब नई थ्योरी आई है कि आम के आगे दुनियाभर के काम-धंधे बौने हैं। यकीन न हो तो सुर्खियां बटोर रहे जबलपुर के कथित जापानी आम के किस्से सुन लीजिए। एक किलो आम की कीमत है दो लाख 70 हजार रुपये। इसलिए रखवाली बंदूकधारी करते हैं। जब से लोगों ने इस आम के बारे में सुना है उनका किसी और काम-धंधे में मन ही नहीं लग रहा है। कह रहे हैं कि अब तो वे यही आम उगाएंगे। पांच-दस किलो भी फल गया तो लाखों में खेलेंगे। वहीं छोटे-मोटे आम की नस्ल तैयार करने वाले कृषि विज्ञानिकों को यह बात नागवार गुजर रही है। वे कह रहे हैं कि जब तक आम का डीएनए टेस्ट नहीं होगा वे मानेंगे ही नहीं कि जापानी आम है, और इसकी इतनी कीमत है।

बुढ़ापे की लाठी की मार, आंखों में छलका प्यार

पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है, पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है। पिता है तो बच्चों के सारे सपने हैं, पिता है तो बाजार के सारे खिलौने अपने हैं। दुनिया में केवल पिता ही ऐसा इंसान है जो चाहता है कि उसके बच्चे उससे भी ज्यादा कामयाब हों। इंटरनेट मीडिया में इस तरह के संदेशों से लोगों ने पिता के उपकारों को याद किया। मातृ दिवस की तरह पितृ दिवस पर भी संदेशों की बाढ़ परवान चढ़ी। पिता के लिए आदर के इतने संदेश देख वृद्धाश्रमों में दिन गुजार रहे अनेकों पिता की आखें डबडबा गईं। औलाद की यातनाएं सहने के बाद भी उसके दिखावटी प्यार से सुख की अनुभूति कर ली। बुढ़ापे की लाठी की मार से उपजे दर्द पर मरहम लग गया। दिल में अपार दर्द होने के बाद भी औलाद के लिए दुआएं ही निकलीं।

संस्कारधानी की गौरवगाथा में आई नवचेतना

जाबालि ऋषि की तपस्थली, आचार्य रजनीश की कर्मभूमि, विनोबा भावे की संस्कारधानी और मध्यप्रदेश की न्यायधानी जबलपुर को झंडाधानी बनने का भी गौरव प्राप्त है। यह सभी के लिए अत्यंत हर्ष का विषय है, विशेषकर युवाओं के लिए। देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश और उसके हृदय स्थल जबलपुर में 98 साल पहले झंडा लहराने का बीज-वपन हुआ था, जो कालांतर में वटवृक्ष बना। आजादी के बाद जन जन की आन बान शान तिरंगा घर-घर में लहरा रहा है। आजादी की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में देशभर में होने वाले अमृत महोत्सव की शुरुआत भी जबलपुर से होने से संस्कारधानी की गौरवगाथा में नवसंचार हुआ है। देशभक्त युवाओं में नवचेतना प्रस्फुटित हुई है। इसको अब जन जन की चेतना में पल्लवित-पुष्पित करने की जरूरत है ताकि दो वर्ष बाद झंडा सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में संस्कारधानी की गौरवगाथा का स्वर्णिम अध्याय लिखा जा सके।

सामने कोरोना का काल, अब टीका में गोलमाल

तुम डाल-डाल, हम पात-पात। सरकार कितने ही नियम-कायदे क्यों न बना ले, शातिर इसका तोड़ निकाल ही लेते हैं। तभी तो कोरोनाकाल में भी गोलमाल जारी है। संक्रमित मरीजों की संख्या में गोलमाल, टेस्टिंग में गोलमाल, मृतकों की संख्या में गोलमाल, मरीजों के सर्वे में गोलमाल, उपचार में गोलमाल, दवाइयों में गोलमाल चल ही रहा था कि टीका में भी गोलमाल चालू हो गया। कहीं टीकों का हिसाब नहीं मिल रहा तो कहीं अनगिनत डोज बर्बाद कर दी जा रही हैं। हद तो तब हो गई जब एक दंपती को बिना टीका लगे ही कंप्यूटर में टीका लगा दर्ज हो गया। टीका लगवाने पहुंचे दंपती को जब यह पता चला तो पैरों तले जमीन खिसक गई। पूछ बैठे कि क्या टीका भी कोरोना जैसे चुपचाप शरीर में प्रवेश कर रहा है, जो उनके टीकाकरण केंद्र पहुंचने से पहले ही लगा दिखाने लगा।

Posted By: Brajesh Shukla
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