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जबलपुर में रानी दुर्गावती के शासन काल में विट्ठलनाथ महाराज ने शुरू किया शरदोत्सव

Updated: | Thu, 29 Oct 2020 10:01 PM (IST)

जबलपुर(नईदुनिया रिपोर्टर)।

16 कलाओं से युक्त चंद्रमा और ऊर्जा स्वरूप चंद्र से अमृत वर्षा का खास दिन शरद पूर्णिमा या कोजागिरी पूर्णिमा। शहर के इतिहास से भी शरद पूर्णिमा उत्सव मनाए जाने की कथा जुड़ी हुई है। इतिहासविद डॉ. आनंद सिंह राणा के अनुसार वीरांगना रानी दुर्गावती के प्रयासों से शहर में शरद पूर्णिमा उत्सव की शुरुआत हुई। परिणामस्वरूप गढ़ा (तत्कालीन मुख्य शहर) का नाम लघु काशी वृंदावन पड़ा।

वीरांगना रानी दुर्गावती मूलत: चंदेल राजकुमारी थी। शादी के बाद गोंडवाना वंश में शामिल हुई थीं। सनातनी परंपरा निर्वहन के लिए उनका अंतर्मन हमेशा प्रयासरत रहा। रानी की कोशिशों व प्रभाव से विट्ठलनाथ महाराज उस समय के मुख्य शहर गढ़ा में आए और तीन वर्ष रहे। गौरतलब है कि विट्ठलनाथ महाराज महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुत्र थे। इस नाते वैष्णव परंपरा के निर्वाह में शरद पूर्णिमा उत्सव की शुरुआत विट्ठलनाथ महाराज ने की। यह बात है लगभग 1563 की। जो रानी दुर्गावती का शासन काल था। रानी ने विट्ठलनाथ महाराज को उस समय 108 गांव दिए थे। विट्ठलनाथ महाराज ने शुद्ध अद्वैतमत की शुरुआत की। गढ़ा में लंबे समय तक शरद पूर्णिमा उत्सव होने के कारण गढ़ा का नाम लघु काशी वृंदावन पड़ गया। यह उत्सव उस समय इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मुगलों का शासनकाल विस्तार पर था। रानी व विट्ठलनाथ के प्रभाव से गढ़ा एक प्रमुख वैष्णव केंद्र बन चुका था। आज भी गढ़ा स्थित पचमठा मंदिर में शरद पूर्णिमा पर पूजन का आयोजन किया जाता है।

शरद पूर्णिमा मनाने की कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि समुद्र मंथन में मां लक्ष्मी का अवतरण शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने कामदेव के मद को चूर करने के लिए शरद पूर्णिमा को ही महारास किया था। पूर्णिमा की इस रात को चंद्रमा से अमृत झरता है, इसलिए यह रात में खीर बनाकर खुले आकाश के नीचे रखने की भी परंपरा बनी हुई है। जिससे खीर में चंद्रमा का अमृत झरे और सभी उस खीर को खाकर स्वस्थ व कुशल रहें।

Posted By: Brajesh Shukla
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