Sawan 2021: MP में पहाड़ी की गोद में शिप्रा नदी के पास है स्वयंभू अनादि कल्पेश्वर महादेव मंदिर

Updated: | Sat, 31 Jul 2021 09:08 PM (IST)

Sawan 2021: आलोट (रतलाम)। नगर से महज एक किलोमीटर दूर अति प्राचीन स्वयंभू अनादि कल्पेश्वर महादेव का मंदिर एक छोटीसी पहाड़ी की गोद में स्थित है। प्राकृतिक सुंदर से परिपूर्ण यह स्थल जनजन की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। यहां विराजित शिवलिंग स्वयंभू है। यह राजा नल-दमयंती की तपस्या से प्रसन्ना होकर प्रकट हुए थे। इस स्थान पर कनक पर्वत, कलेवा कुंड और पर्वत पर हनुमान जी के पदचिह्न, विश्राम करते हुए हनुमान जी भी विराजमान हैं। पर्वत में भृतहरि गुफा भी है, जो उज्जैन तक निकलती है।

इस तीर्थ स्थल के पौराणिक महत्व और मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्य के कारण श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। श्रावण माह में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और विभिन्न नदियों के जल से अभिषेक करते हैं। भगवान की शाही सवारी भी नगर में हर वर्ष निकलती है। महाशिवरात्रि पर मेला भी आयोजित होता है। यह मेला पशु मेले के नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर से मात्र चार किलोमीटर दूर शिप्रा नदी है। यहां पर 13 वर्षों से मंदिर का जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा है। अब तक करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मंदिर निर्माण का कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है।

आज भी है हनुमान जी के पैरों के निशान

पुजारी जितेंद्र व्यास ने बताया कि नगर के पास धरोला की पहाड़ियों के बीच स्थित अनादिकल्पेश्वर महादेव का मंदिर प्राचीन है। यह तत्कालीन देवास स्टेट की रियासत के समय उनके पूर्वजों ने बनाया था। तत्कालीन देवास स्टेट के राजा विक्रमसिंह ने उक्त मंदिर में आकर पुत्र रत्न की मांग की थी। पुत्र रत्न की प्राप्ति होने पर वे हर महाशिवरात्रि पर आकर यहां पूजा करते थे। उनके स्वजन यहां आते रहते हैं। मंदिर का शास्त्रों में भी उल्लेख है। हनुमान जी जब राम के लिए संजीवनी बूटी लेकर जा रहे थे, तब इस पर्वत पर कुछ क्षण के लिए रुके थे। आज भी उनके पैरों के निशान हैं। वर्ष में एक बार यह पर्वत कुछ क्षण के लिए सोने जैसा दिखता है, इसलिए इसे कनक पर्वत भी कहते हैं।

स्वर्ण का तुलादान किया था

पुजारी पंडित अनिल रावल ने बताया कि धरोला की पहाड़ियों के बीच स्वयंभू अनादि कल्पेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास पुराना है। शास्त्रों के अनुसार स्वयंभू से आशय भक्त की प्रेरणा उत्पन्ना होने वाले शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है। कहा जाता है कि राजा नल एवं दमयंती ने विपत्ति काल में अपने राज्य को छोड़कर यहां समय व्यतीत था। उन्होंने इसका चमत्कार देखकर अपने वजन के बराबर स्वर्ण का तुलादान किया था। वर्तमान में यह स्थान जन-जन की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां अनेक स्थानों के दर्शनार्थी आते हैं।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay