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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 11, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

भोरमदेव मंदिर : ऐसी है इस ऐतिहासिक मंदिर की कहानी

छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए आते है।

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Publish Date: Sat, 11 Aug 2018 03:17:12 PM (IST)Updated Date: Sun, 12 Aug 2018 07:50:03 AM (IST)
भोरमदेव मंदिर : ऐसी है इस ऐतिहासिक मंदिर की कहानी

कवर्धा । छत्तीसगढ़ का खुजराहो कहा जाना वाला भोरमदेव का मंदिर 11वीं शताब्दी के अंत में निर्मित मंदिर है। यह मंदिर राजधानी रायपुर से 120 किमी दूर और कवर्धा जिला मुख्यालय से 17 किमी दूर मैकल पर्वत श्रृंखला में ग्राम छपरी के निकट स्थित है। इस मंदिर में वैष्णव व जैन प्रतिमाएं भारतीय संस्कृति एवं कला की उत्कृष्टता की परिचायक हैं। इन प्रतिमाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि धार्मिक व सहिष्णु राजाओं ने सभी धर्मावलंबियों को उदार प्रश्रय दिया था ।

गोंड़ जाति के उपास्य देव भोरमदेव (जो कि महादेव शिव का एक नाम है) के नाम पर मंदिर निर्मित कराये जाने पर स्थान का नाम भोरमदेव पड़ गया है और आज भी इसी नाम के प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण श्री लक्ष्मण देव राय द्वारा कराया गया था।


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इसकी जानकारी हमें वर्तमान में मंडप में रखी एक दाढ़ी-मूंछ वाले योगी की बैठी मूर्ति (जो 0.89 से.मी.ऊंची एवं 0.67 से.मी. चौड़ी है) पर उत्कीर्ण लेख से होती है। इसी प्रतिमा पर उत्कीर्ण दूसरे लेख में कल्चुरि संवत 840 तिथि दी हुई है।

इससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि मंदिर छठे पुणि नागवंशी शासक श्री गोपालदेव के शासनकाल में निर्मित हुआ। मंडप पर कुल 16 स्तंभ है। मंदिर में तीन प्रवेश द्वार हैं-प्रमुख द्वार पूर्वदिशा की ओर, दूसरे का मुख दक्षिण की ओर एवं तीसरा अर्द्ध मंडप, उससे लगा हुआ अंतराल और गर्भगृह है।

मंदिर की जंघा पर कोणार्क के सूर्य मंदिर एवं खजुराहो को मंदिरों की भांति सामाजिक एवं गृहस्थ जीवन से संबंधित अनेक मैथुन दृश्य तीन पंक्तियों में कलात्मक अभिप्रायों समेत उकेरे गए हैं, जिनके माध्यम से समाज के गृहस्थ जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

11वीं शताब्दी में बने इस मंदिर में यूं तो साल भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन सावन माह में यहां आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। नर्मदा का जल लेकर बड़ी संख्या में भक्तगण यहां जलाभिषेक करने आते है।

मंदिर समिति द्वारा सावन के लिए विशेष तैयारी की जाती है। यहां मंदिर के आसपास फूल-माला और पूजा सामग्री की दुकानें सजी रहती है। यहां छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए आते है। सुरक्षा के लिए यहां मंदिर के समीप पुलिस चौकी भी खोली गई है।