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ये थे 2 दुर्लभ शिव भक्त, जिन्हें लोग आज भी रखते हैं याद

Updated: | Mon, 24 Aug 2015 10:26 AM (IST)

श्रीरंगपट्ट्नम द्वीप, बेंगलुरू से 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां स्थित है जंबूकेश्वर मंदिर जहां है जलतत्वशिवलिंग। यहां शिवलिंग पर निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है।

पहले था जामुन का जंगल

जंबूकेश्वर मंदिर मंदिर में कई मंडप हैं। जिनमें सोमस्कंदमंडप की शिल्पकला काफी भव्य है। कहते हैं इस मंडप का निर्माण भगवान राम ने कराया था। मंदिर के पांचवे घेरे में नटराज सुब्रह्मण्य, दक्षिणामूर्ति आदि देवविग्रह हैं। यहां प्राचीन समय में जामुन के पेड़ों का जंगल था।

यहां है पंचमुखी शिवलिंग

जंबूकेश्वर मंदिर सौ बीघा क्षेत्र में फैले जंबूकेश्वर मंदिर के तीन आंगन हैं। मंदिर प्रवेश करने पर जिस आंगन में यात्री पहुंचते हैं। यहां शंकराचार्य की मूर्ति भी है। जंबूकेश्वर मंदिर की तीसरी परिक्रमा में सुब्रह्मण्यम् का मंदिर है। इस मंदिर में अनेक भव्य एवं कलात्मक मंदिर हैं। मंदिर की परिक्रमा में श्री राजराजेश्वर मंदिर है, जिसमें भगवान शिव का पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है।

शिलालेख में कथा का उल्लेख

तमिल भाषा के एक शिलालेख में एक मकड़ी और एक हाथी की भक्ति पर आधारित कथा का उल्लेख मिलता है। ये पौराणिक कहानी कुछ इस तरह है। जामुन के जंगल होने के कारण, इन वृक्षों के पत्ते यहां स्थित शिवलिंग पर गिरा करते थे।

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शिवलिंग को बचाने के लिए एक मकड़ी ने शिवलिंग के ऊपर जाला बुन देती है और उसी जंगल में रहने वाला एक हाथी सूंड में जल लाकर प्रतिदिन शिवलिंग का जलाभिषेक करता था। हाथी के जलाभिषेक से मकड़ी का जाला टूट जाता तो मकड़ी फिर से जाला बुनती।

इस तरह कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। हाथी को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि मकड़ी शिवलिंग के ऊपर जाल बुने, एक दिन मकड़ी को मारने के उद्देश्य से हाथी ने अपनी सूंड आगे की ओर बड़ाई।

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वह मकड़ी हाथी की सूंड में चली गई। हुआ यूं कि हाथी और मकड़ी दोनों की ही मृत्यु हो गई। अपनी-अपनी शिवभक्ति के कारण दोनों ही भगवान शिव के परम धाम चले गए। इस कथा के भित्ती चित्र यहां उल्लेखित हैं।

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