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रावण की आभा देख हनुमानजी थे आश्चर्यचकित

Updated: | Thu, 06 Aug 2015 10:10 AM (IST)

वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड के एकादश सर्ग मे उल्लेख है, 'पहले समुद्र सहित पृथ्वी दैत्यों के अधिकार मे थी। भगवान विष्णु ने युद्ध मे दैत्यों को मार कर इस पर आधिपत्य स्थापित किया था।

हिंदू पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि ब्रह्माजी की तीसरी पीढी मे उत्पन्न ऋषि विश्रवा का पुत्र दशग्रीव बडा पराक्रमी और परम तपस्वी था।

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भगवान विष्णु के भय से पीडित दशग्रीव लंका छोड कर रसातल में रहने लगा, जहां राक्षस कुल का उद्धार रावण ने किया और लंका को पुनः प्राप्त किया।

सुन्दर काण्ड के दशम् सर्ग मे उल्लेख मिलता है कि हनुमानजी ने राक्षस राज रावण को तपते हुए सूर्य के समान तेज और बल से संपन्न देखा। वह सुंदर स्त्रियों से घिरा रावण कांतिवान नक्षत्रपति चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था।

राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, दैत्यों,गंधर्वों और राक्षसों की कन्याएं उसके वशीभूत हो उसकी पत्नियां बनी थीं। वहां कोई ऐसी स्त्री नहीं थी,जिसे बल पराक्रम से संपन्न होने पर भी रावण उसकी इच्छा के विरुद्ध हर लाया हो।

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शयनागार में सोते हुए रावण के एक मुख और दो भुजाओं का ही उल्लेख है। श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न रावण परम तपस्वी, ज्ञान-विज्ञान मे दक्ष, कलाओं का मर्मज्ञ और श्रेष्ठ संगीतकार था उसके विलक्षण व्यक्तित्व के कारण ही उसकी मृत्यु के समय राम ने लक्ष्मण को उसके समीप शिक्षा लेने भेजा था।

यह उल्लेख भी बहुत कम रचनाकारों ने अपने ग्रंथों और काव्यों में किया है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार रावण ने कभी सीता को पाने का प्रयत्न नहीं किया मानस में धनुष-यज्ञ में वह उपस्थित था पर उसने धनुष को हाथ नहीं लगाया।

वाल्मीकि रामायण के 'सुन्दरकाण्ड' में वर्णित है कि रात्रि के पिछले प्रहर में छहों अंगों सहित वेदों के विद्वान और श्रेष्ठ यज्ञों को करने वालों के कंठों की वेदपाठ-ध्वनि गूंजने लगती थी। इससे लंका के वातावरण का आभास मिलता है।

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