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Sharad Purnima 2020 End: लक्ष्‍मी उपासना और खीर के भोग के साथ शरद पूर्णिमा का समापन, जानिये इसके बारे में सब कुछ

Updated: | Sun, 01 Nov 2020 01:43 AM (IST)

Sharad Purnima 2020 End: आरोग्‍य के पर्व शरद पूर्णिमा का समापन हो गया है। 31 अक्टूबर रात 8 बजकर 18 मिनट पर पूर्णिमा तिथि समाप्त हुई। स्नान दान व्रत एवं धार्मिक अनुष्ठान इसी दिन संपन्न हुए। शरद पूर्णिमा का अमृतमयी चांद अपनी किरणों में स्‍वास्‍थ्‍य का वरदान लेकर आता है। शरद पूर्णिमा हिंदू पंचांग में सबसे धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण पूर्णिमा की रातों में से एक है। यह पर्व शरद ऋतु (ऋतु) में आता है और यह आश्विन (सितंबर / अक्टूबर) के महीने में पूर्णिमा (पूर्णिमा की रात) तिथि को मनाया जाता है। इस उत्सव को कौमुदी, यानी मूनलाइट या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। शरद पूर्णिमा को भारत के कई राज्यों में फसल उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है और मानसून के बाद सर्दियों के मौसम की शुरुआत भी होती है। इस समय सबसे विशेष महत्‍व खीर खाने का माना जाता है। चंद्रमा की रोशनी में खीर को रखा जाता है और किरणों को उसके प्रभाव में पूरी तरह आने के बाद इस खीर को रोगियों को दिया जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि खीर के सेवन से रोगों का इलाज हो जाता है।

क्‍या है शरद पूर्णिमा

अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। यूं तो साल में 12 पूर्णिमा तिथियां आती हैं। लेकिन अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को बहुत खास माना जाता है। इसे शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। शरद पूर्णिमा से ही शरद ऋतु का आगमन होता है। शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी से रात्रि में भी चारों और उजियारा रहता है। सनातन धर्म की परंपरा में आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाने की धार्मिक और पौराणिक परंपरा रही है। शरद पूर्णिमा के पर्व को कौमुदी उत्‍सव, कुमार उत्सव, शरदोत्सव, रास पूर्णिमा, कोजागिरी पूर्णिमा एवं कमला पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस पूर्णिमा में अनोखी चमत्कारी शक्ति निहित मानी जाती है। ज्योतिष गणना के अनुसार संपूर्ण वर्ष में आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन ही चंद्रमा 16 कलाओं से युक्त होता है। 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा से निकली रोशनी समस्त रूपों वाली बताई गई है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है जबकि रात्रि को दिखाई देने वाला चंद्रमा अपेक्षाकृत अधिक बड़ा होता है। ऐसी मान्यता है कि भू लोक पर लक्ष्मी जी घर घर विचरण करती हैं, जो जागता रहता है उस पर उनकी विशेष कृपा होती है।

शरद पूर्णिमा 2020 तिथि और समय

इस बार, शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर 2020 शुक्रवार को है।

पूर्णिमा तिथि (शुरू) - शाम 17:45 (30 अक्टूबर 2020)

पूर्णिमा तिथि (अंत) - रात 20:21 बजे (31 अक्टूबर 2020)

शरद पूर्णिमा खीर के लाभ

शरद पूर्णिमा की रात्रि में आकाश के नीचे रखी जाने वाली खीर को खाने से शरीर में पित्त का प्रकोप और मलेरिया का खतरा भी कम हो जाता है। यदि आपकी आंखों की रोशनी कम हो गई है तो इस पवित्र खीर का सेवन करने से आंखों की रोशनी में सुधार हो जाता है। अस्थमा रोगियों को शरद पूर्णिमा में रखी खीर को सुबह 4 बजे के आसपास खाना चाहिए। शरद पूर्णिमा की खीर को खाने से हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। साथ ही श्वास संबंधी बीमारी भी दूर हो जाती है। पवित्र खीर के सेवन से स्किन संबंधी समस्याओं और चर्म रोग भी ठीक हो जाता है।

चंद्रमा की रोशनी में खीर को रखने का यह है कारण

एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

खीर के सेवन से पहले रखें यह ध्‍यान

शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है। वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान बनकर आती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औ‍षधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।

खीर के अंदर अपना प्रतिबिंब देखें

शरद पूर्णिमा के दिन जब आप पूर्ण चंद्र का दर्शन करोगे उस समय आप पूर्ण चंद्र का दर्शन करके ओम नमो श्री चंद्राय नमः श्री ओम नमो श्री सोमाय नमः इसका भी आप जाप करके चंद्र भगवान को आप संतुष्ट कर सकते हैं। प्रसन्न कर सकते हैं इसके लिए आप अच्छी विधि विधान से आप खीर बनाएं। अच्छे से और उसमें चंद्र का प्रतिबंध ज्यादा तौर पर खुला बर्तन रखे जिससे चंद्र का प्रतिबिंब खीर में ज्यादा देर तक आ जाए। उस खीर के अंदर अपना प्रतिबिंब देख कर अपना मुख का प्रतिबंध देख कर के आप उसे सेवन कर सकते हो जिससे आपको लाभ सुनिश्चित मिलेगा तथा चंद्र की दोस्त आपकी कुंडली में कम हो जाएंगे।

शरद पूर्णिमा के साथ होगा 'ब्लू मून', 19 साल बाद दोबारा होगी ऐसी खगोलीय घटना

Blue Moon 2020: शरद पूर्णिमा के साथ आज 'ब्लू मून' भी होगा। आपको बता दें की यह खगोलीय घटना 19 साल बाद दोबारा होगी। शरद पूर्णिमा का यह त्‍योहार धार्मिक महत्‍व के लिए तो जानी जाता है इसके साथ ही अपनी खूबसूरती के लिए यह मून बेहत खास माना जाता है। यानी शरद पूर्णिमा पर चांद की खूबसूरती आपने मिस कर दी तो आप बहुत कुछ मिस कर देंगे। इस रात को चंद्रमा सबसे खूबसूरत नजर आता है और उसके दीदार करने के लिए सभी लोग अपनी छतों पर इंतजार कर करते हैं। ब्लू नाम का अर्थ है कि एक ही महीने एक पूर्णिमा की तिथि होती है, लेकिन इस महीने एक महीने में यह तिथि दो बार पड़ रही है। पहली पूर्णिमा 1 अक्टूबर को थी वहीं दूसरी पूर्णिमा 30 या 31 अक्टूबर को है। ऐसे में दूसी पूर्णिमा का चांद ही ब्लू मून कहलाता है।

शरद पूर्णिमा पर बन रहे हैं खास योग

इस बार 2020 को शरद पूर्णिमा पर अमृदसिद्धि योग बन रहा है। 30 अक्टूबर 2020 शु्क्रवार के दिन मध्यरात्रि में अश्विनी नक्षत्र रहेगा। साथ ही इस दिन 27 योगों के अंतर्गत आने वाला वज्रयोग, वाणिज्य / विशिष्ट करण तथा मेष राशि का चंद्रमा रहेगा। ज्योतिष के अनुसार, शरद पूर्णिमा को मोह रात्रि कहा जाता है। श्रीभगवद्गीता के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर रासलीला के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने शिव पार्वती को निमंत्रण भेजा था। वहीं जब पार्वती जी ने शिवजी से आज्ञा मांगी तो उन्होंन स्वयं जाने की इच्छा प्रकट की। इसलिए इस रात्रि को मोह रात्रि कहा जाता है।

चंद्रमा की किरणों से आरोग्‍य का संबंध :

आरोग्य लाभ के लिए शरद पूर्णिमा के चरणों में औषधीय गुण विद्यमान रहते हैं। शरद पूर्णिमा की रात्रि में दूध से बनी खीर को चांदनी की रोशनी में अति स्वच्छ वस्त्र से ढंक कर रखी जाती है। ध्‍यान रहे कि चंद्रमा के प्रकाश की किरणें उस पर पड़ती रहें। भक्ति भाव से प्रसाद के तौर पर भक्तों में वितरण करके स्वयं भी ग्रहण करते हैं। जिससे स्वास्थ्य लाभ होता है तथा जीवन में सुख सौभाग्य की वृद्धि होती है।

ऐसे करें शरद पूर्णिमा अनुष्ठान

शरद पूर्णिमा के शुभ दिन पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें। इसके बाद एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उसके बाद उस पर देवी लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर रखें। फिर, देवी लक्ष्मी को लाल फूल, नैवेद्य, इत्र और अन्य सुगंधित चीजें अर्पित करें। देवी मां को सुन्दर वस्त्र, आभूषण, और अन्य श्रंगार से अलंकृत करें। मां लक्ष्मी का आह्वान करें और उन्हें फूल, धूप (अगरबत्ती), दीप (दीपक), नैवेद्य, सुपारी, दक्षिणा आदि अर्पित करें और उसकी पूजा करें। एक बार इन सभी चीजों को अर्पित करने के बाद, देवी लक्ष्मी के मंत्र और लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। देवी लक्ष्मी की पूजा धूप और दीप (दीपक) से करें। साथ ही देवी लक्ष्मी की आरती करना भी आवश्यक है। इसके बाद देवी लक्ष्मी को खीर चढ़ाएं। इसके अलावा इस दिन खीर किसी ब्राह्मण को दान करना ना भूलें। गाय के दूध से खीर तैयार करें। इसमें घी और चीनी मिलाएं। इसे भोग के रूप में धन की देवी को मध्यरात्रि में अर्पित करें। रात में, भोग लगे प्रसाद को चंद्रमा की रोशनी में रखें और दूसरे दिन इसका सेवन करें। सुनिश्चित करें कि इसे प्रसाद की तरह वितरित किया जाना चाहिए और पूरे परिवार के साथ साझा किया जाना चाहिए। शरद पूर्णिमा व्रत (उपवास) पर कथा (कहानी) अवश्य सुनें। कथा से पहले, एक कलश में पानी रखें, एक गिलास में गेहूं भर लें, साथ ही पत्ते के दोने में रोली और चावल रखें और कलश की पूजा करें, तत्पश्चात दक्षिणा अर्पित करें। इसके अलावा इस शुभ दिन पर भगवान शिव, देवी पार्वती और भगवान कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है।

यह है शरद पूर्णिमा की पूजा विधि :

श्री लक्ष्‍मी को वस्त्र, पुष्प, धूप, दीप, गंध, अक्षत, तांबूल, सुपारी, ऋतु फल एवं विविध प्रकार के मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। दूध से बनी खीर जिसमें दूध, चावल, मिश्री, मेवा, शुद्ध देसी घी मिश्रित हो उसका नैवेद्य का भोग भी लगाया जाता है। रात्रि में अपनी शरद पूर्णिमा तिथि पर भगवती श्री लक्ष्मी की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। लक्ष्मी जी के समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करके उनकी महिमा में श्री सूक्त, श्री कनकधारास्राेत, श्री लक्ष्मी स्तुति, श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने एवं श्री लक्ष्मी जी के प्रिय मंत्र 'ओम श्री नमः' जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

शरद पूर्णिमा का दिन सबसे महत्वपूर्ण

शरद पूर्णिमा का दिन सबसे महत्वपूर्ण इसलिए माना जाता है कि इस दिन में जो हम लोग दूध का उपयोग करके जो खीर बनाते हैं और उसे हम रात में चंद्र का प्रतिबिंब देखकर उसे सेवन किया जाता है यह खास करके चंद्र का जब प्रतिबंध उस खीर में पड़ता है तो चंद्र की जो शक्तियां होती है वह उस दूध में समाविष्ट होती है और जिसके कुंडली में चंद्र कमजोर है चंद्र के पाप ग्रह की दृष्टि है वैसे लोगों को यह उपाय सबसे बड़ा कारगर साबित होता है और तो और इसमें अगर थोड़ा केसर मिला दिया जाए तो इसमें बहुत अच्छा होता है गुरु और चंद्र का मिलन इसमें देखा गया है और इस खेल का महत्व बहुत अच्छे से होगा जिससे अपने शरीर की कई बीमारियां नष्ट होती है और तो और गुरु और चंद्र का जो प्रभाव है एक साथ मिलकर हमारे बॉडी में असर करता है। हमारे कुंडली पर भी असर करता है उस दिन कर्क राशि के जातकों के लिए खास शुभ माना गया है।

पूर्णिमा पर होगी लक्ष्‍मी के इन आठ स्‍वरूपों की पूजा :

श्री लक्ष्मी जी के आठ स्वरूप माने गए हैं जिनमें धनलक्ष्मी, धान्‍यलक्ष्‍मी, राज लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी, ऐश्वर्या लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, कमला लक्ष्मी एवं विजय लक्ष्मी है लक्ष्मी जी की पूजा अर्चना आदि रात्रि में किया जाता है। इस बार 30 अक्टूबर शुक्रवार को रात्रि में लक्ष्मी जी की विधि विधान पूर्वक पूजा का आयोजन किया जाएगा। कार्तिक स्नान के यम व्रत व नियम तथा दीपदान 31 अक्टूबर शनिवार से प्रारंभ हो जाएंगे। जबकि पूजा के विधान के तौर पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समस्त कार्यों से निवृत होकर अपने आराध्य देवी देवता की पूजा के बाद शरद पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

यह है पौराणिक मान्यता :

ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म सभी सोलह कलाओं के साथ हुआ था। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किए गए धार्मिक अनुष्ठान या समारोह बेहतर परिणाम देते हैं। पौराणिक मान्‍यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने अश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन यमुना तट पर मुरली वादन करके गोपियों के संग रास रचाया था। जिसके फलस्वरूप इस दिन उपवास रखते हुए इस उत्सव को मनाते हैं। इस दिन खुशियों के साथ हर्ष उल्लास के संग रात्रि जागरण भी करते हैं। शरद पूर्णिमा पर, चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है। शरद पूर्णिमा का चंद्रमा उन किरणों को उत्सर्जित करता है जिनके पास अविश्वसनीय चिकित्सा और पौष्टिक गुण होते हैं। इसके अलावा, यह माना जाता है कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है तो इस दिन भक्त खीर तैयार करते हैं और इस मिठाई का कटोरा सीधे चंद्रमा की रोशनी में रख देते हैं ताकि चंद्रमा की सभी सकारात्मक और दिव्य किरणों को इकट्ठा किया जा सके। अगले दिन, इस खीर को प्रसाद के रूप में सभी के बीच वितरित किया जाता है।

शरद पूर्णिमा का दिन हिंदू धर्म में बहुत महत्व

शरद पूर्णिमा का दिन हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी धरती पर विचरण करने निकलती हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा का शुभ अवसर देवी लक्ष्मी को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि यदि आप इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तो आप उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, और आपके जीवन में धन की कोई कमी नहीं होगी। इस शुभ दिन भक्तगण शरद पूर्णिमा व्रत का पालन करते हैं और समृद्धि और धन के देवता देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि कोई सामान्य दिन नहीं है। इस दिन चाँदनी सबसे चमकीली होती है। ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा सभी सोलह कलाओं के साथ अपनी पूर्ण महिमा में चमकता है। भारतीय ज्योतिष में, यह माना जाता है कि प्रत्येक कला एक मानव गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व करती है और इन सभी 16 कलाओं का समामेलन एक आदर्श व्यक्तित्व बनाता है।

पुरखों के स्‍मरण का अवसर :

इस पूर्णिमा को कोजागिरी पूर्णिमा भी कहा जाता है शरद पूर्णिमा की रात्रि से कार्तिक पूर्णिमा की रात तक आकाश दीप जलाकर दीपदान करने की महिमा मानी गई है। दीप दान करने से समस्त प्रकार के दुख दूर होते हैं तथा सुख समृद्धि का आगमन होता है, आकाश दीप प्रज्वलित करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।

(उक्‍त आलेख ख्‍यात हस्तरेखातज्ञ. विनोद्जी पंडित. गुरुजी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार )

Posted By: Navodit Saktawat
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