मनोज भदौरिया, आलीराजपुर। बड़े पैमाने पर मतांतरण को लेकर चर्चित रहे आदिवासी बहुल आलीराजपुर जिले में सनातन संस्कृति के ध्वज लहराने लगे हैं। जिस जिले में कई गांव मतांतरित हो गए थे, वहां दो दशक से हिंदू संगठन तरह-तरह के आयोजन कर आदिवासियों को सनातन धर्म की रीति और संस्कृति से जोड़ने में लगे हैं। अब यहां सनातन धर्म के प्रतीक भी सामने आने लगे हैं। जिले की सबसे बड़ी पंचायत नानपुर के गांव तीती में पिछले दिनों बावड़ी की खोदाई से सैकड़ों साल पुरानी भगवान विष्णु, काली माता, शिव, हनुमान, गणेश, श्रीराम-लक्ष्मण-सीता, कालभैरव आदि की एक दर्जन से अधिक मूर्तियां निकलीं तो आदिवासियों ने जंगल में ही चबूतरा बनाकर उन्हें न सिर्फ स्थापित कर दिया, बल्कि नियमित रूप से पूजा भी कर रहे हैं।

बुजुर्ग आदिवासी कहते हैं कि ये हमारे पूर्वजों की धरोहर हैं। मुस्लिम आक्रांताओं से बचाने के लिए इन्हें बावड़ी में रखने के किस्से हमने सुने थे, लेकिन वह बावड़ी कहां थी, यह किसी को पता नहीं था। गांव तीती निवासी पुजारी बहादुर कहते हैं कि गांव में एक प्राचीन बावड़ी थी। बुजुर्ग बताते थे कि कभी यहां आसपास की कई बस्तियों के लोग पानी भरने आते थे। कालांतर में बावड़ी का अस्तित्व खत्म हो गया। खोदाई करने पर सबसे पहले हनुमानजी की पाषाण मूर्ति निकली थी। इसके बाद अन्य ग्रामीणों ने भी सहयोग किया तो एक दर्जन से अधिक मूर्तियां निकल आईं। पास ही चबूतरा बनाकर इनको स्थापित कर दिया है।

ग्रामीणों का मानना है कि यहां पूर्व में ये मूर्तियां मंदिर में स्थापित रही होंगी। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले के समय इन्हें बावड़ी में डालकर बंद कर दिया गया। गांव के हेमर सिंह बताते हैं कि फिलहाल पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से यहां कोई नहीं आया है, इसलिए मूर्तियां कितनी प्राचीन हैं, यह साफ नहीं हो सका है। बनावट देखकर कहा जा सकता है कि ये सैकड़ों साल पुरानी हैं।

आदिवासियों में रचाबसा है सनातन धम

गांव तीती में मिली मूर्तियों सहित अन्य उदाहरण से भी साफ है कि आदिवासियों में सदियों से सनातन धर्म रचा-बसा है। हिंदू धर्म से जुड़ा कोई भी पर्व, त्योहार या आराधना का अवसर हो, आदिवासी अंचल में धूमधाम से मनाया जाता है। यहां के गांव-फलियों में भगवान गणपति की स्थापना कर 10 दिन आराधना की जाती है तो नवरात्र में मैया की नृत्य आराधना होती है। सकल आदिवासी समुदाय आस्था व उल्लास से भाग लेता है।

राम क्यों प्रिय

माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास के समय आदिवासियों के बीच अधिक समय बिताया। आदिवासियों में आज भी श्रीराम से गहरा जुड़ाव देखा जा सकता है। मसलन, आदिवासी अभिवादन स्वरूप सदैव राम-राम ही कहते हैं। यह सिलसिला अरसे से चल रहा है। आदिवासियों के पारंपरिक अस्त्र भी धनुष-बाण ही हैं, जिनका वे सदियों से उपयोग करते आ रहे हैं।

बावड़ी में मिली मूर्तियों की जानकारी 'नईदुनिया' से मिली है। मूर्तियों का अवलोकन कर उन्हें संरक्षित किया जाएगा। - डीपी पांडे, सहायक संचालक, पुरातत्व विभाग इंदौर

Posted By: Prashant Pandey

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