Sacrifice Day Special: मनोज भदौरिया आलीराजपुर/चंद्रशेखर आजादनगर। जो चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय क्रांति के नायक रहे, उनके भीतर देशभक्ति का बीज वर्तमान मध्य प्रदेश के आलीराजपुर जिले के भाबरा (अब चंद्रशेखर आजाद नगर) में प्रस्फुटित हुआ था। आजाद ने यहीं स्थित पुरानी गढ़ी क्षेत्र में आदिवासी बच्चों के साथ तीर से निशाना साधना सीखा था। इसी मिट्टी ने चंद्रशेखर को 'आजाद' बनाया था। अंग्रेजों की पराधीनता से मुक्ति के लिए आजाद के मन में क्रांति के बीज यहीं पड़ गए थे।

बालक चंद्रशेखर घंटों आदिवासी बच्चों के साथ भाबरा की पुरानी गढ़ी में तीर-कमान लेकर निशाना लगाने का अभ्यास किया करते थे। यह अभ्यास अंग्रेजों से लड़ाई में उन्हें खूब काम आया। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी, पत्नी जगरानी देवी के साथ वर्तमान उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिला स्थित बदरका गांव से मध्य प्रदेश के आलीराजपुर आ गए थे। यहां उन्हें तत्कालीन आलीराजपुर रियासत में नौकरी मिली थी।

कुछ दिन आलीराजपुर में रहने के बाद उन्हें भाबरा नामक कस्बे का काम सौंपा गया, तो वे भाबरा में रहने लगे। यहीं एक कुटिया में 23 जुलाई 1906 को महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी यहीं पर हुई। इसके बाद माता जगरानी देवी की इच्छा के अनुसार करीब 10 वर्ष की उम्र में चंद्रशेखर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए बनारस (उप्र) भेज दिया गया। महज 25 साल की उम्र में उन्होंने 27 फरवरी, 1931 को भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

तब कई घरों में नहीं जला था चूल्हा

आलीराजपुर निवासी व्यवसायी हरीश त्रिवेदी अपने पिता रामनारायण त्रिवेदी से सुनी घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं- 'जब आजाद के बलिदान की खबर मिली थी, तो भाबरा के कई घरों में उस दिन चूल्हा नहीं जला था। गांव सहित पूरे इलाके में शोक की लहर छा गई थी।' यहीं के निवासी खुर्शीद अली दीवान ने भी अपने दादा अहमद अली दीवान से आजाद के किस्से सुने हैं। वे बताते हैं, तब मेरे दादाजी आलीराजपुर रियासत के कर्मचारी थे और भाबरा में पदस्थ थे। घर के पास ही आजाद का परिवार निवास करता था। दादा सुनाते थे कि फरारी के दौरान अंग्रेजों से बचते हुए आजाद भाबरा आए थे। तब गढ़ी पर उनकी मुलाकात आजाद से हुई थी। आजाद ने परिवार की कुशलक्षेम पूछी थी। वे अपने गांव से बहुत प्रेम करते थे।'

कुटिया को दे दिया अब नया स्वरूप

जिस कुटिया में चंद्रशेखर ने जन्म लिया था, उसका मूल स्वरूप अब शेष नहीं बचा है। कुटिया को नया रूप दिया गया है। कुटिया के पास ही राज्य सरकार ने वर्ष 2012 में आजाद स्मृति मंदिर का निर्माण करवाया था। भाबरा का नाम बदलकर तब चंद्रशेखर आजादनगर किया गया। आजाद स्मृति मंदिर में आजाद की सात फीट की अष्टधातु से बनी प्रतिमा स्थापित है। यहां आजाद से जुड़ा साहित्य और तस्वीरें भी हैं। नगर के आजाद मैदान में अमर शहीद की अष्टधातु की 14 फीट ऊंची प्रतिमा भी स्थापित है। नगर की पहचान आजाद की जन्मभूमि के रूप में देश-दुनिया में है। बड़ी संख्या में लोग यहां अमर शहीद को नमन करने आते हैं।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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