दस विधि स्नान करने के बाद श्रावणी उपाकर्म उत्सव का समापन पूर्ण आहूर्ति से किया गया

अशोकनगर। नवदुनिया न्यूज श्रावण शुक्ल पूर्णिमा पर ब्राहम्णों ने दो अलग-अलग स्थानों पर श्रावणी उपाकर्म उत्सव मनाया। इस मौके पर दस विधि स्नान कर आत्मशुद्घी की गई और आत्म कल्याण के लिए मंत्रों के साथ हवन यज्ञ का आयोजन कर आहुतियां दी गई। इस मौके पर नदियों में जाकर तर्पण किया गया। यह सम्पूर्ण आयोजन अशोकनगर से 8 किमी दूर त्रिवेणी नदी के संगम स्थल पर तूमैन में आयोजित किया गया।

श्रावणी उपाकर्म उत्सव में कहा गया है कि जो यज्ञोपवीत धारण करता है उसे यह श्रावणी उपाकर्म उत्सव मनाना चाहिए इससे आत्मशुद्घि होती है। इस उपाकर्म उत्सव में वैदिक विधि से हेमाद्री प्राप्त, प्रायश्चित संकल्प, सूर्याराधन, दस विधि स्नान, तर्पण, सूर्योपस्थान, यज्ञोपवीत धारण, प्राणायाम, अग्निहोत्र व ऋ षि पूजन आदि का आयोजन किया गया। इस दौरान सामूहिक मंत्रोच्चार के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शुद्घि की गई। इस दौरान विप्र बंधुओं ने कोरोना वायरस संक्रमण से संपूर्ण देश और पूरे विश्व को महामारी के प्रकोप को समाप्त करने की अपील की गई। यह श्रावणी उपाक्रम वैदिक काल से चली आ रही शाश्वत परम्परा है। उपाक्रम का अर्थ है प्रारंभ करना । उपाकरण का अर्थ है आरंभ करने के लिए निमंत्रण या निकट लाना। वैदिक काल में यह वेदों के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्रित होने का काल था। इसके आयोजन काल के बारे में धर्मगंथों में लिखा गया है कि - जब वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं, श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) या हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को उपाकर्म होता है। इस अध्ययन सत्र का समापन, उत्सर्जन या उत्सर्ग कहलाता था। यह सत्र माघ शुक्ल प्रतिपदा या पौष पूर्णिमा तक चलता था। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के शुभ दिन रक्षाबंधन के साथ ही श्रावणी उपाकर्म का पवित्र संयोग बनता है। विशेषकर यह पुण्य दिन ब्राह्मण समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है।

यह जीवन जीने की एक वैज्ञानिक प्रकिया है। यह प्रकृति की सहज प्रक्रिया है। श्रावणी उपाक्रम श्रावण शुक्ल पंचमी को ही किए जाने की व्यवस्था है। कई पुराणों में इसका जिक्र मिलता है जिसमें हेमाद्री कल्प, स्कंदपुराण, निर्णय सिंधू, धर्मसिंधू आदि है। श्रावणी पर्व जीवन को प्रखर बनाने का पर्व है। श्रावणी उपाक्रम के तीन पक्ष है जिनमें प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। जिनमें यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। यह वह दिन है जिनका संस्कार हो चुका है वह पुराना यज्ञोपवीत उतारकर नया धारण करते है और पुराने यज्ञोपवीत का पूजन भी करते है। यही सबकुछ त्रिवेणी नदी के संगम पर देखने को मिला। यह जीवन शोधन की अति महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इस मौके पर पं रामबाबू शास्त्री, जगदीश शास्त्री, अवध बिहारी कटारे, उपेन्द्र पारासर, अवधेश शर्मा, सीटू पाठक, विवेक शर्मा, अभिषेक चौधरी आदि शामिल थे।

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फोटो37ए- त्रिवेणी नदी के घाट पर विप्रसमाज ने श्रावणी उपाक्रम उत्सव मनाया।

फोटो37बी- नदी के जल में ईश्वर की आराधना की गई।

Posted By: Nai Dunia News Network

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