माही महेश चौहान बालाघाट (नईदुनिया)

रासायनिक खाद से हो रही खेती से मानव जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है। साथ ही जमीन की उर्वरक क्षमता भी कम हो रही है। अधिक उत्पादन की प्रतिस्पर्धा के चलते देसी किस्म भी विलुप्त होने की कगार पर है। ऐसे में कुछ किसान देसी किस्म को बचाने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। बालाघाट के किसान देश की सबसे पहली किस्म माने जाने वाले पैगंबरई व देसी किस्म बंशी गेहूं का उत्पादन पहली बार कर रहे हैं।

इस जैविक खाद से ले रहे फसल : पैगंबरई व बंशी किस्म के उत्पादन के लिए किसान दस किलो गोबर, दस लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड़, एक किलो मही और पचास लीटर पानी से जैविक खाद बना रहे हैं। इसका छिड़काव गेहूं की बोवाई से लेकर फसल तैयार करने में किया जाएगा। जैविक खाद के उपयोग से जमीन उपजाऊ और फसल की पैदावार भी अच्छी होती है। पहले कम उत्पादन होने से इन देसी किस्म की खेती करना अधिकतर किसानों ने बंद कर दिया था।

गेहूं की प्राचीन किस्म है पैगंबरई : जिले के अर्जुनसिंह सनोड़िया समेत सात किसान इन देसी किस्मों का उत्पादन कर रहे हैं। किसान सचिन जैन, चोवालाल पारधी ने बताया कि पैगंबरई गेहूं देश की सबसे प्राचीन किस्म है जिसका दाना धनिया के आकार का होता है और पौधा भी काफी छोटा होता है। इस किस्म का पता खंडवा के कृषि वैज्ञानिकों ने लगाया है। साथ ही रिसर्च में उन्होंने पाया है कि इस गेहूं में फाइबर, पौषक तत्व व एंडीऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में होते हैं जिससे ये स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद भी है। साथ ही इस गेहूं के सेवन से गैस संबंधित बीमारियां भी दूर होती हैं।

बंशी का अधिक उत्पादन नरसिंहपुर में : गेहूं की देसी किस्म बंशी का उत्पादन मप्र के नरसिंहपुर जिले के किसान अधिक कर रहे हैं। बालाघाट के किसानों ने भी बंशी गेहूं के बीज मंगाकर जैविक पद्धति से खेती शुरू की है। देसी किस्मों का उत्पादन कम होता है। सामान्यत तौर पर एक एकड़ में 15-20 क्विंटल गेहूं पैदा होता है, तो इन देसी किस्मों की पैदावार 10-12 क्विंटल ही होती है। लेकिन पौष्टिक गुणों के चलते सामान्य गेहूं से अधिक दाम पर बिकते हैं। अनुमान के मुताबिक पैगंबरई गेहूं 50-60 और बंशी 60-65 रुपये प्रति किग्रा. तक बिकता है।

पैगंबरई व बंशी देसी किस्म हैं जिसमें पौष्टिक गुण अधिक होते हैं। जिले के किसान इन किस्मों का जैविक पद्धति से उत्पादन कर रहे हैं। यह देसी किस्म को बचाने के प्रयास के साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।

-डॉ. आरएल राउत, विज्ञानी प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र बड़गांव बालाघाट।

Posted By: Nai Dunia News Network

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