माही महेश चौहान, बालाघाट। एक शिक्षक के ऊपर न सिर्फ बच्चों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी होती है, बल्कि उनका भविष्य संवारना भी उसके हाथों में होता है, लेकिन नक्सल प्रभावित बालाघाट के ऐसे आदिवासी क्षेत्र जहां नक्सलियों के डर से शिक्षक नियमित स्कूल तक नहीं पहुंच पाते हैं।

वहां एक उच्च श्रेणी शिक्षक इन आदिवासी बच्चों का भविष्य संवारने पूरी मेहनत कर रहे हैं। ये आदिवासी बच्चे भी उनके सिखाए हुनर की बदौलत राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में न केवल उम्दा प्रदर्शन कर रहे हैं, बल्कि खेल के ही दम पर पुलिस, वन विभाग और केंद्रीय सुरक्षा बल जैसे शासकीय संस्थानों में नौकरियां भी प्राप्त कर रहे हैं।

अति पिछड़े की श्रेणी में आते है ये गांव

बालाघाट की बैहर तहसील में शासकीय समनापुर हाई स्कूल में नक्सल प्रभावित और अति पिछड़े गांव भीमलाट, बेहराखार, समनापुर, मुक्की समेत अन्य गांवों के बच्चे पढ़ने आते हैं। इन गांवों की स्थिति ये है कि यहां के लोगों के पास रोजगार के तक साधन नहीं हैं। ऐसे अभाव की स्थिति में स्कूल तक पहुंचने वाले बच्चों को स्कूल के प्रधानपाठक खेल शिक्षक बनकर कबड्डी, वॉलीबॉल, गोला फेंक, तवा फेंक, लंबी कूद, ऊंची कूद जैसे खेलों में स्वयं ही प्रशिक्षित कर उन्हें आदिवासी विकासखंडों में आयोजित होने वाली प्रतियोगिताओं में स्वयं के खर्च से लेकर जाते हैं, जिससे बच्चों के अंदर भी खेल के प्रति भाव पैदा होते हैं और वे बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

रोजाना एक घंटे कराते हैं प्रैक्टिस

करीब 15 साल पहले लालबर्रा स्कूल से स्थानातंरित होकर एचपी मेरावी बैहर समनापुर की शासकीय स्कूल में पहुंचे थे। उन्होंने इन बच्चों को स्वयं प्रधानपाठक होते हुए भी हुनर सिखाने का जिम्मा उठाया और रोजाना एक घंटे बच्चों को कबड्डी, वॉलीबॉल, गोला फेंक, तवा फेंक, लंबी कूद, ऊंची कूद की प्रैक्टिस कराते हैं। ये बच्चे प्रतियोगिता के लिए तैयार हो सकें, इसके लिए स्वयं ही बिरसा, बैहर समेत जगहों पर आयोजित खेल प्रतियोगिताओं में उन्हें ले जाकर न सिर्फ जानकारी उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उनके आने-जाने का खर्च भी स्वयं उठाते हैं।

वर्तमान में स्कूल के ये बच्चे राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी

वर्तमान समय में समनापुर स्कूल के बालिकाओं के सीनियर वर्ग में राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल प्रतियोगिता में भी प्रदेश का नेतृत्व किया है। इसमें सविता, भूमिका, सानू, रंजना शामिल है। वहीं जूनियर वर्ग में रीना धुर्वे, शालू, कुसुम लता, पूजा, सावित्री ने अत्यंत पिछड़े क्षेत्र में रहने के बाद भी प्रधानपाठक के खेल प्रशिक्षण ओर आर्थिक मदद के चलते राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है।

प्रधानपाठक का काम सबसे अलग

स्कूल के शिक्षक मनोहर बंसोड़ बताते हैं कि समनापुर स्कूल में दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों के बच्चे आते हैं। इन बच्चों के पास पैसों की कमी, बाहर जाने की जानकारी भी नहीं होती है। ऐसे में मिडिल स्कूल के प्रधानपाठक का इन बच्चों के लिए खेल शिक्षक बन उन्हें ट्रेंड करना और इन आदिवासी बच्चों की प्रतिभा को सामने लाना उनके भविष्य को उज्जवल बना रहा है। साथ ही आर्थिक रूप से मदद करना बच्चों के अंदर शिक्षा के साथ ही खेल का जज्बा भी पैदा कर रहा है।

Posted By: Hemant Upadhyay