हितेश अजीत, बालाघाट (रजेगांव)। नवदुनिया हाथों की लकीरों में तकदीर तलाशने वालों के लिए यह महज मिसाल होगी, लेकिन उनके लिए यह प्रेरणा भी है कि जिनके हाथों में हथेली की लकीर नहीं होती हैं, वे भी अपने हौसले के बूते अपनी तकदीर लिखते हैं। जी हां ! ये पंक्तियां हट्टा संकुल के पाथरी प्राइमरी स्कूल के शिक्षक राकेश पंद्रे पर सही बैठती है। बचपन में ही एक हादसे ने उनके दोनों हाथ छीन लिए, लेकिन हौसले ने उन्हें टूटने नहीं दिया। तकदीर की कठिनाइयों के बीच हौसले के बल पर दोनों हाथ की कोहनी से कलम थामकर राकेश ने आगे बढ़ना सीखा तो कभी पीछे पलटकर नहीं देखा, कुशाग्र बुद्धि के राकेश ने शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट सफलता अर्जित की।

अव्वल श्रेणी से पढ़ाई करने के बाद अब वे खुद शिक्षक बनकर बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं। राकेश बताते हैं कि जब वे कक्षा दूसरी में पढ़ते थे, तभी खेलने के दौरान हाइटेंशन लाइन की चपेट में आने से वे बुरी तरह झुलस गए थे और इस हादसे में उनके दोनों हाथ आधे कट गए। करीब 7 साल की उम्र से पांच से सात साल तक परिवार वालों ने उनका खूब इलाज कराया। तब जाकर वे जिंदगी की जंग जीत पाए। इसके बाद राकेश ने फिर पढ़ना शुरू किया और पढ़ने की लगन से उन्हें सफलता मिलती चली गई।

जिंदगी से लड़ना ही जिंदगी

पंद्रे राकेश पंद्रे का कहना है कि जिंदगी में निराशा पैदा करने वाले और उत्साह बढ़ाने वाले दोनों तरह के लोग मिलते हैं, लेकिन कठिनाइयां हर किसी की जिंदगी में होती हैं, इनसे लड़कर आगे बढ़ना ही जिंदगी का दूसरा नाम है। हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाना चाहिए। राकेश ने कहा कि वे अपने परिवार का शुक्रगुजार हैं।

Posted By: Saurabh Mishra

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