Barwani News: युवराज गुप्ता, बड़वानी। तन की लाचारी पर मन की हिम्मत भारी होती है। कुछ लोगों ने तन की दिव्यांगता के बाद भी मन के हौसलों से जिंदगी की जंग जीती है। ऐसे ही लोग बड़वानी जिले में भी हैं, जिन्होंने दिव्यांगता को पराजित करते हुए देश-विदेश में न सिर्फ ख्याति पाई बल्कि अपनी अलग पहचान बनाई है। अलग-अलग विधाओं में न सिर्फ जिले का बल्कि मध्यप्रदेश और देश का गौरव बढ़ाया है। ऐसे कुछ खिलाड़ियों के संघर्ष पर नई दुनिया की रिपोर्ट।

दिव्यांग कोटे में देश में पहली रैंक पाई

सेंधवा तहसील के ग्राम पाड़छा के एक गरीब किसान के बेटे शोभाराम डेमसिंह रावत ने अपनी मेहनत से दिव्यांग कोटे में देश में पहली रैंक पाई है। शोभाराम बचपन से ही क्रिकेट का खिलाड़ी था, लेकिन पैरों की दिव्यांगता के कारण वह इस विधा में आगे नहीं बढ़ पाया। फिर अपने दिमाग की ताकत का इस्तेमाल किया और इस दिशा में मेहनत की। शोभाराम के अनुसार यूजीसी नेट जेआरएफ की दिसंबर 2021 एवं जून 2022 की संयुक्त परीक्षा में इतिहास विषय में दिव्यांग कोटे में देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया। रावत की प्रारंभिक शिक्षा श्रीकांता विकलांग सेवा ट्रस्ट झाकर एवं उच्च शिक्षा सेंधवा से पूरी हुई। रावत ने बताया कि प्रतिदिन 12 से 13 घंटे तक पढ़ाई की। बगैर कोचिंग के परीक्षा दी और देश में पहला स्थान पाया। इस परीक्षा में करीब दस से 12 लाख लोग शामिल होते हैं। रावत के पिता डेमसिंह मध्यमवर्गीय किसान है। उन्होंने बेटे की पढ़ाई के लिए कर्ज भी लिया है। इसके अलावा रावत का लक्ष्‌य पीएससी परीक्षा पास करके सहायक प्राध्यापक बनने का है। उनका चयन हाई कोर्ट व वर्ग दो शिक्षक के लिए हो चुका है।

पैरों में दिव्यांगता, हाथों में जबरदस्त दम

जिले के एक छोटे से गांव भीलखेड़ा के निवासी खिलाड़ी मनोज पटेल जिले के एकमात्र आर्म रेसलर हैं। पैरों की दिव्यांगता के बाद उन्होंने हाथों की मजबूती से देश-विदेश में अपनी ताकत दिखाकर अलग ही धाक जमाई और पदक पाए। जून माह में 44वीं नेशनल आर्म रेसलिंग प्रतियोगिता हैदराबाद तेलंगाना में हुई थी। इसमें 80 किलो दिव्यांग वर्ग में मनोज ने सिल्वर मेडल प्राप्त किया, वहीं इससे पूर्व भिलाई, नागपुर, नई दिल्ली व उत्तरप्रदेश के लखनऊ शहर में आयोजित स्पर्धाओं में रजत व कांस्य पदक जीते। वहीं वर्ष 2019 में वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप रोमानिया में हुई। उसमें उन्होंने नौवें वें स्थान पर रहकर देश का नाम रोशन किया। खिलाड़ी मनोज अभी राजपुर के कृषि विभाग में कार्यरत हैं। आगे भी अन्य प्रतियोगिताओं के लिए तैयारी कर रहे हैं। मनोज की भी प्रारंभिक शिक्षा निवाली के श्रीकांता विकलांग सेवा ट्रस्ट झाकर में हुई। यहां दिव्यांगों को कोर्स की पढ़ाई के साथ खेल-कूद की शिक्षा भी दी जाती है। मनोज ने एक पैर से दिव्यांग होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और लगातार राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं को लेकर तैयारी की और पदक जीते।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व

पानसेमल के दिव्यांग खिलाड़ी जितेंद्र वाघ ने भी क्रिकेट में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाई है। एक हाथ से दिव्यांगता के बावजूद क्रिकेट बेहतर खेल लेते हैं। दिव्यांगों की एक अलग ही स्पर्धा होती है। नेपाल व बांग्लादेश में दो बार अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग क्रिकेट स्पर्धाओं में जितेंद्र ने मध्यप्रदेश से एकमात्र खिलाड़ी होकर देश का प्रतिनिधित्व किया। वहां ट्राफी जीती।

समाज की सेवा कर पा रहे ख्याति

शिक्षक व सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश सोलंकी दिव्यांगता के बावजूद समाजसेवा के कार्य में जुटे हैं। विविध सामाजिक कार्यों में सहभागिता कर ख्याति अर्जित कर चुके हैं। 50 वर्षीय शिक्षक दिनेश दोनों पैर से दिव्यांग हैं। इस दिव्यांगता के बावजूद निवाली क्षेत्र के आसपास के गांवों में सतत भ्रमण कर बालिका शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं। कई दिव्यांग बालिकाओं को निवाली के शासकीय कस्तूरबा आश्रम में प्रवेश दिलाकर उनकी पढ़ाई पूरी कराई। इसके अलावा उन्हें सतत मार्गदर्शन दे रहे हैं। इस कार्य के लिए विविध सम्मान पा चुके हैं।

एक हाथ से पावर लिफ्टिंग कर पाया गोल्ड

बड़वानी के रहने वाले पावर लिफ्टिंग के खिलाड़ी पवन मनीराम इस्के के अनुसार बचपन में हाईटेंशन लाइन से करंट लगने से उनका एक हाथ क्षतिग्रस्त हो गया था। हाथ को डाक्टरों द्वारा काटा गया, वहीं खेल के प्रति रुचि कम नहीं हुई और दूसरे हाथ से पावर लिफ्टिंग की प्रैक्टिस जारी रखी। हाल ही में बड़वानी में हुई जिला स्तरीय पावर लिफ्टिंग स्पर्धा में पवन ने गोल्ड मेडल हासिल किया। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने उन्हें पुरस्कृत किया।

इनका कहना है

जिले का नाम रोशन करने वाले दिव्यांग व अन्य प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया जाएगा। इनकी मेहनत व लगन सराहनीय है।

- शिवराजसिंह वर्मा, कलेक्टर बड़वानी

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Posted By: Nai Dunia News Network

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