Nag Panchami 2022Special: बड़वानी। नईदुनिया प्रतिनिधि। सतपुड़ा की हरी-भरी वादियों के बीच ऊंचे पहाड़ी की चोटी शिखरधाम पर बाबा भीलट देव का मंदिर प्रदेश सहित अन्य कई प्रदेशों के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। सामान्य दिनों में यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु बाबा के दर्शन करके धर्मलाभ लेते हैं। वहीं नागपंचमी के अवसर पर लगने वाले मेले में लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

भगवान शिव-पावर्ती के आशीर्वाद से जन्मे थे ‘भीलट देव’

मान्यता है कि बाबा भीलट देव का जन्म करीब 857 वर्ष पूर्व वर्तमान के हरदा जिले के ग्राम रोलगांव पाटन में हुआ था। उनकी माता का नाम मेदाबाई व पिता का नाम नामदेव रेलन राणा था। गवली परिवार के होकर यह दोनों भगवान शिव के परमभक्त थे। उनके घर संतान नहीं थी।

इस पर उन्होंने भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव व मां पार्वती ने खुश होकर सुंदर बेटे के जन्म का आशीर्वाद दिया। मेदाबाई ने सुंदर बेटे को जन्म दिया। वहीं भगवान शिव ने उनसे वचन लिया कि मैं तुम्हारे घर रोज दुध-दही मांगने आऊंगा और यदि तुमने नहीं पहचाना तो बच्चे को साथ ले जाऊंगा।

मेदाबाई व नामदेव बच्चे के लालन-पालन में लग गए। ऐसे में वे भगवान शिव को दिए वचन को भूल गए। इस पर भगवान शिव बालक को उठाकर चाैरागढ़ वर्तमान के पचमढ़ी ले गए और झोली में अपने गले में लिपटा नाग छोड़ गए। पालने में नाग को देख मेदाबाई व नामदेव बेसुध हो गए। उन्होंने फिर भोलेनाथ की आराधना की। भगवान ने कहा कि आपने वचन नहीं निभाया और हमें पहचाना नहीं तो अब बालक की शिक्षा-दीक्षा हम करेंगे।

भक्तों की इच्छापूर्ति के लिए भेजा शिखरधाम

भगवान शिव-पार्वती के मार्गदर्शन में भीलट देव की शिक्षा-दिक्षा चौरागढ़ में हुई। उन्होंने अस्त्र-शस्त्र सहित तंत्र-मंत्र, जादू व युद्ध की शिक्षा भी प्राप्त की। इसके बाद भीलट देव भैरवनाथ के साथ काथूर बंगाल जो कि वर्तमान में कामाख्या देवी मंदिर के पास घने जंगल में स्थित है, पहुंचे।

जहां उन्होंने उस समय के नामी जादूगरों का अंत किया और राजा गंधी की पुत्री से विवाह कर भगवान भोलेनाथ के समक्ष पहुंचे। भगवान ने उन्हें आज्ञा दी कि अब तुम अपने माता-पिता के पास जाओ और वहां से नागलवाड़ी के समीप सतपुड़ा की पहाड़ी पर विराज कर श्रद्धालुओं का कल्याण करो, उनकी इच्छापूर्ति करो। तुम सदैव भीलट देव नागदेवता के रूप में पूजे जाओगे। तब से भीलट देव नागलवाड़ी से करीब चार किमी दूर सतपुड़ा की पहाड़ी स्थित शिखरधाम में विराजित हैं और करोड़ों श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण कर रहे हैं।

रात्रि विश्राम नहीं करते किन्नर

ऐसा प्रचलित है कि नागलवाड़ी में कोई भी किन्नर रात्रि विश्राम नहीं करता है। बताया जाता है कि बाला भीलट देव भगवान शिव-पार्वती की आज्ञा से नागलवाड़ी आए और लोगों की सेवा करने लगे। इस दौरान एक किन्नर ने उनसे संतान की इच्छा जाहिर की। इस पर बाबा ने कहा कि किन्नर को संतान कैसे हो सकती है। वो जिद पर अड़ गई और बाबा ने उसे वरदान दे दिया। उसे नौ घड़ी में नौ माह का गर्भ ठहर गया। प्रसव के दौरान उस किन्नर की मृत्यु हो गई। इस किन्नर की समाधि आज भी नागलवाड़ी में है। इसके बाद बाबा ने श्राप दिया था कि कोई भी किन्नर नागलवाड़ी में रात्रि विश्राम नहीं कर सकता है।

2004 में हुआ भव्य मंदिर का निर्माण

सैकड़ों वर्ष प्राचीन शिखरधाम मंदिर का गुलाबी पत्थरों से निर्माण वर्ष 2004 में हुआ। यहां प्रतिवर्ष नागपंचमी पर भव्य मेले का आयोजन होता है। इसमें कई प्रदेशों के लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। दो वर्ष पूर्व शिखरधाम मंदिर शेड भी लगाया गया है। यहां सामान्य दिनों में वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मनोकामना पूर्ति के लिए दूर-दूर के श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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