बड़वानी। सतपुड़ा की सुरम्य वादियों के बीच बसे बड़वानी जिले का प्राकृतिक वातावरण रमणीय है। लोक संस्कृति से परिपूर्ण इस जिले में वर्तमान में शिक्षा और चिकित्सा दोनों ही क्षेत्रों में धीरे-धीरे उन्नाति हुई है। हालांकि यह उन्नाति भी फिलहाल नाकाफी है, क्योंकि अब भी जिले के दूरस्थ गांवों में चिकित्सा सेवाओं में कमियां है।

साधन और संसाधनों के अभाव में आज भी ग्रामीणों को बेहतर चिकित्सा सुविधा के लिए शहरों की तरफ देखना पड़ता है। शहर की ओर आना पड़ता है। यदि इन गांवों में ही सरकार सुविधाएं और संसाधन मुहैया करा दे तो इन लोगों को अपने गांव में ही बेहतर उपचार की सुविधा मिल सकेगी, तभी सही मायने में हम पूरी तरह आत्मनिभर और विकासशील कहलाएंगे।

मेरा बचपन इसी जिले में बीता है। बड़वानी के ही स्कूल-कालेज में पढ़ाई पूरी की और आगे उच्च शिक्षा के लिए इंदौर के होल्कर साइंस कालेज में गए थे। शुरू से ही यह सपना था कि चिकित्सा क्षेत्र की पढ़ाई के बाद जिले में ही सेवाएं दूं। यही हमारी मातृभूमि के प्रति सच्ची सेवा भी है। बड़वानी में भले ही शासकीय व निजी अस्पतालों की संख्या बहुत हो गई है, अस्पताल तो आधुनिक संसाधनों से लैस हो गए हैं लेकिन अब भी दूरस्थ गांवों में साधन, व्यवस्था और चिकित्सकीय संसाधनों की कमियां है, इन्हें दूर किया जाना चाहिए। यदि दूरस्थ गांवों तक आवागमन के समुचित साधन और वहां पर मौजूद अस्पतालों में संसाधन होंगे तो नए युवा चिकत्सक भी दूर गांवों में सेवाएं देने से परहेज नहीं करेंगे।

तकनीक का सही उपयोग करें, मोबाइल की अति लत ना हो

शिक्षा और मेडिकल के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से नई क्रांति आई है। मोबाइल और अन्य संसाधनों से पढ़ाई आसान हुई है। हालांकि मोबाइल की लत भी खराब है। यह सिर्फ कम्युनिकेशन का ही हिस्सा रहे तो ठीक है। किताबों को पढ़ने की आदत फिर कायम रखना होगी,क्योंकि मोबाइल व अन्य तकनीक की अति भी खराब बात है। तकनीक का सही और संतुलित उपयोग होना चाहिए।

-डा. प्रकाश यादव, वरिष्ठ चिकित्सक एवं समाजसेवी

Posted By: Nai Dunia News Network

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