*पूर्ण डूब के दो वर्ष बाद भी नहीं हुआ लोगों की समस्याओं का निराकरण

*तीसरे दिन जारी रहा धरना, एनवीडीए कार्यालय में नहीं पहुंचे अधिकारी

बड़वानी (नईदुनिया प्रतिनिधि)। सरदार सरोवर परियोजना की डूब को लेकर प्रभावितों द्वारा अपनी मांगों व अधिकार को लेकर जिले में बीते साढ़े तीन दशकों से आंदोलन किया जा रहा है। दो वर्ष पूर्व बांध को पूर्ण रूप से भरने के समय मूल गांव में जो लोग रह गए थे, उन्हें विभिन्ना स्थानों पर अस्थायी टिनशेड बनाकर दिए गए, जो अब लोगों की स्थायी व्यवस्था बनने लगे हैं। वहीं डूब के बाद लोगों को जो अधिकार मिलने थे, जिम्मेदार उससे मुंह फेर चुके हैं।

यह बात नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता मुकेश भगोरिया ने गुरुवार को कही। उन्होंने बताया कि तीन दिन से धरना जारी है। अब तक अधिकारी नहीं आया। उनकी मांग की है कि अधिकारी फेस-टू-फेस चर्चा कर निराकरण करें। बता दें कि नबआं के नेतृत्व में विभिन्ना डूब गांवों के सैकड़ों प्रभावित इस समय जिला मुख्यालय स्थित एनवीडीए कार्यालय के सामने धरना देकर बैठ गए हैं। इतना ही नहीं, प्रभावित गेट के सामने ही दिन-रात काटते हुए चूल्हा जलाते हुए भोजन-पानी कर रहे हैं। सुरक्षा बतौर पुलिस के तीन-चार जवान दिन-रात पहरा दे रहे हैं। प्रभावित नारेबाजी कर अपनी मांगों को जिम्मेदारों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

सैकड़ों प्रभावितों को अब भी हक मिलना बाकी

नबआं के मुकेश भगोरिया ने बताया कि आठ फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया था। उसमें 31 जुलाई तक प्रभावितों को पुनर्वास स्थलों पर व्यवस्था करने और उनके हक सौंप देना था, जो अब तक सरकार ने नहीं किया। 2018 में डूब आई लेकिन लेवल कम रहा। इसके बाद 2019 में बांध को पूर्ण रूप से भर दिया गया। इससे जिले में नर्मदा 138.60 मीटर पर पहुंची तो सभी तटीय गांव डूब गए। तत्कालीन रूप से प्रशासन ने प्रभावितों को न्याय का लालच देकर टिनशेड में भेज दिया लेकिन दो वर्ष बाद भी वो न्याय के लिए भटक रहे हैं। अब भी सैकड़ों परिवारों को मकान बनाने के 5.80 लाख रुपये, घर-प्लाट सहित पात्रता अनुसार 15 व 60 लाख रुपये मिलने बाकी हैं।

पटवारी ने दिया पट्टा, अधिकारी ने निरस्त किया

इसी तरह ग्राम पिछोड़ी के पप्पू पुत्र सुखलाल ने बताया कि ग्राम सोंदूल में उनको प्लाट मिला था। उन्होंने उसे वहां से बदलवा कर जामदा बसाहट में परिवर्तित करवाया। इस काम के लिए एक पटवारी ने उनसे 29 हजार रुपये रिश्वत के तौर पर लिए और पट्टा दिया। उन्होंने तीन लाख रुपये खर्च कर मकान बनाया, लेकिन बाद में अधिकारियों ने पट्टा निरस्त कर दिया। प्रभावितों ने बताया कि पिछोड़ी में 400 लोगों को भूखंड पात्रता है लेकिन उन्हें अलग-अलग स्थानों पर प्लाट दिए। वहीं उनके खेत मूलगांवों के पास हैं। ऐसे में उन्हें 20 से 25 किमी दूर प्लाट देने का क्या औचित्य रहा? जबकि वहीं शासन के पास अधिग्रहित जमीनें थी, उन पर बसाहट बसाई जा सकती थी।

Posted By: Nai Dunia News Network

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