बैतूल, नवदुनिया प्रतिनिधि। एक ओर हमारा देश आजादी की 75 वी वर्षगांठ में अमृत महोत्सव मनाने की तैयारी कर रहा है वहीं जिले के कई गांव आज भी जरूरी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। ऐसा ही एक गांव है जामुन ढाना, जहां के आदिवासी हर वर्षा काल के दिनों मे अपनों की जिंदगी बचाने के लिए खुद जिंदगी को दाव पर लगाकर सफर करते हैं।

गांव पहुचने पर पड़ने वाली नदी पर पुल नही बनने की वजह से हालात ये है कि वर्षा के मौसम में जब भी गांव में कोई बीमार पड़ता है, ये लोग उसे खाट पर लिटाकर चार कंधों से अपनी जान को जोखिम में डालकर उफनती नदी को पार करके मरीज को अस्पताल ले जाते हैं। बुधवार को गांव के लोगो को फिर अपनी जान को जोखिम में डालना पड़ा। जामुन ढाना गांव के रूपेश टेकाम की गर्भवती पत्नी मयंती टेकाम को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। तेज वर्षा से जामुन ढाना की नदी में बाढ़ थी। अस्पताल जाने के लिए नदी पार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। रूपेश ने गांव के लोगो से मदद मांगी। ग्रामीणों ने रूपेश का साथ देते हुए उसकी गर्भवती पत्नी मयंती को खाट पर लिटाकर अपनी जान की परवाह किए बिना उफनती नदी पार की और उसे उपचार के लिए शाहपुर के अस्पताल ले जाने के लिए निकले। लेकिन माचना नदी उफान पर होने के कारण उन्हें वापस लौटकर महिला को भौरा के शासकीय अस्पताल ले जाना पड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि कई बार गुहार लगाने के बाद भी ना तो वोट मांगकर सरकार बनाने वाले राजनेता ने उनकी पीड़ा समझी और ना ही विकास की गंगा बहाने वाली सरकार के अधिकारियों ने इनकी सुध ली।

Posted By: Ravindra Soni

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