बैतूल। विनय वर्मा। उनके भीतर एक खिलाड़ी का जुनून और जज्बा ही था जो कैंसर जैसी बीमारी के आखिरी स्टेज पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और दूसरे कैंसर पीड़ितों को भी 'जीत का मंत्र दे रहे हैं। यह कहानी है शहर के वरिष्ठ हॉकी खिलाड़ी हेमंतचंद्र दुबे (बबलू) की।

उनकी बचपन से ही हॉकी में रुचि थी। साल-दर-साल उनके भीतर का खिलाड़ी निखरता रहा। पढ़ाई लिखाई खत्म हो गई पर खेल बदस्तूर जारी रहा। इसी बीच 2011 में वे बीमार रहने लगे। जांच में पता चला कि उन्हें कैंसर है और वो थर्ड स्टेज में पहुंच चुका है, लेकिन खिलाड़ी बबलू इससे जरा भी विचलित नहीं हुए।

मुंबई में उनका इलाज चला और पूरे 3 सालों तक उनकी जंग कैंसर के साथ चलती रही। 2014 में जब फिर जांच हुई तो वे कैंसर से पूरी तरह से मुक्त चुके थे। कैंसर के दौरान बबलू को इस बात का अनुभव हो चुका था कि इस बीमारी के होने पर मरीज और उनका परिवार किन परेशानियों से जूझता है।

लिहाजा, उन्होंने कैंसर मरीजों की मदद को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। देश भर के हॉकी खिलाड़ियों को भी उन्होंने अपने इस अभियान से जोड़ा। हेमंतचंद्र बताते हैं कि कैंसर का पता चलते ही मरीज ही नहीं बल्कि परिजन भी टूट जाते हैं ऐसे में सबसे पहले हम उन्हें हौसला देकर उचित मार्गदर्शन देते हैं और सही उपचार के लिए तैयार करते हैं। आर्थिक मदद भी इकट्ठा करते हैं।

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