भिंड से अब्बास अहमद। भारत में अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें कमजोर करने वाली सन् 1857 की क्रांति के स्वर्णिम इतिहास का भिंड जिला भी गवाह रहा है। अंग्रेजों की ताकत के बोलबाले के बावजूद जिले के लोगों ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का खुलकर साथ दिया था। भिंड के लोगों की मदद मिलने से ही लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर पर विजय हासिल की थी। इतिहासकार देवेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि आजादी के लिए जिले के लोगों में दीवानापन था। यहां के लोगों ने एक बार नहीं, बल्कि कई बार अंग्रेजी सैनिकों को मार भगाया था।

यही वजह है कि अंग्रेजी हुकूमत ने इस इलाके को दुनियाभर में बदनाम किया। कालपी में अंग्रेजों से संघर्ष के बाद महारानी लक्ष्मीबाई 26 मई 1858 को भिंड के पास गोपालपुरा पहुंची। यहीं पर उन्होंने देश की आजादी के लिए ग्वालियर को क्रांति का केंद्र बनाने का निर्णय लिया था। तब लक्ष्मीबाई का जिले के एक लाख लोगों ने साथ दिया था। लक्ष्मीबाई मिहोना, अमायन, देहगांव, सुपावली, बड़ागांव मुरार में पड़ाव करते हुए ग्वालियर पहुंची थीं। 1 जून 1858 को ग्वालियर पर विजय हासिल की थी। हालांकि बाद में यहीं पर अंग्रेजों से भीषण संग्राम में 18 जून को वे शहीद हो गईं।

नदौरी के 31 क्रांतिकारियों को काला पानी की सजा : इटावा कलेक्टर एओ ह्यूम ने नदौरी गांव में ग्वालियर राज्य की सेना और अंग्रेजी फौज के साथ मिलकर कहर बरपाया था। पूरा नदौरी गांव नष्ट कर दिया गया था। नदौरी के 31 योद्धाओं को काला पानी की सजा दी गई थी। गांव के लोगों को क्रांतिकारियों को शरण देने के आरोप में यातनाएं दी गईं। अंचल के चार तालुकादारों की संपत्ति जब्त कर ली गई थी। भिंड क्षेत्र के सूबा सरकार प्रमुख (कलेक्टर) को बर्खास्त कर दिया गया था। क्रांतिकारियों की भनक नहीं लग पाने के कारण तहसीलदार, दरोगा और जमादार को भी जेल में डाल दिया गया था।

ग्वालियर राज्य के प्रमुख सलाहकार पंडित हरनाथ ने 43 क्रांतिकारियों की सूची एओ ह्यूम को दी थी। इनमें बंकट सिंह का नाम था। इनमें से एक क्रांतिकारी को भिंड में ही फांसी दी गई। इसका उल्लेख सिलेक्टिड रायटिंग्स ऑफ एओ ह्यूम वाल्यूम-1 में मिलता है।

गुमनामी में चंबल के शहीदों का इतिहास : इतिहासकार देवेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि चंबल के शहीदों का इतिहास गुमनामी के अंधेरों में रहा है। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के इन गुमनाम नायकों को और भिंड के लोगों के बलिदान को रोशनी में लाने के लिए समय-समय पर प्रयास किए जाते रहे हैं। जैसे पूर्व भाजपा सांसद डॉ. भागीरथ प्रसाद ने 26 मई से 1 जून 2017 तक झांसी के महारानी मार्ग पर पदयात्रा की थी। खुद देवेंद्र सिंह चौहान '1857 पचनद घाटी के रणबांकुरे' और '1857 की राज्य क्रांति और जननायक निरंजन सिंह चौहान' नामक किताब के माध्यम से चंबल के क्रांतिकारियों की कहानियों को देश के सामने लेकर आए हैं।

कई क्रांतिकारियों के नाम दस्तावेज में

इटावा के तत्कालीन कलेक्टर एओ ह्यूम द्वारा लिखे गए दस्तावेजों में चंबल के आजादी के दीवानों का उल्लेख मिलता है। सन् 1857 की क्रांति पर पूरे विश्व की निगाह थी। भिंड के अमायन के राजा भगवत सिंह कुशवाह, सांकरी के वीर झड़ा सिंह भदौरिया, पांडरी वाले शहीद रूपचंद्र पांडे, ग्वालियर में चौथी पलटन के सैनिक अली अहमद खां पठान, बोहरा भिंड के दौलत सिंह कुशवाह, चिमनाजी उर्फ हरीशचंद्र कुशवाह, ककहरा के वीर बंकट सिंह कुशवाह, नदोरी के नायक, कचोंगरा के रणधीर सिंह भदौरिया ऐसे बड़े नाम हैं, जिनके कारण अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिलनें लगी थीं। अंग्रेजों के जमाने के दस्तावेजों में इसके तमाम साक्ष्य हैं।