भिंड। 'टेसू के भई टेसू के पान पसेरी के उड़ गए तीतर रह गए मोर सड़ी डुकरिया लै गए चोर चोरन के जब खेती भई खाय डुकटटो मोटी भई '। दशहरे के बाद पूर्णिमा तक लड़कों की टोलियां टेसू और लड़कियों की टोलियां सांझी लिए घर-घर घूमकर गीत गाते और पैसे मांगते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में पुरानी परंपराएं विलुप्त होने की कगार पर हैं। इतिहासकर पूरनसिंह बताते है की टेसू का आरम्भ महाभारत काल से ही हो गया था। कुंती को क्वांरी अवस्था में ही उसे दो पुत्र उत्पन्ना हुए थे, जिनमें पहला पुत्र बब्बरावाहन था, जिसे कुंती जंगल में छोड़ आई थी। कुछ सालों बाद तो उसने बहुत ही उपद्रव करना शुरु कर दिया। पाण्डव उससे बहुत परेशान रहने लगे, तो सुभद्रा ने भगवान कृष्ण से कहा कि वे उन्हें बब्बरावाहन के आतंक से बचाएं। कृष्ण भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन काट दी। परन्तु बब्बरावाहन तो अमृत पी गया था इसलिए वह मरा ही नहीं। कृष्ण ने उसके सिर को छेकुंर के पेड़ पर रख दिया। लेकिन फिर भी बब्बरावाहन शान्त नहीं हुआ तो कृष्ण ने अपनी माया से सांझी को उत्पन्ना किया और टेसू से उसका विवाह रचाया था।

(फोटोः रविरमन प्रजापति)

फोटो सहित क्रमांक 16