भिंड, दबोह( नईदुनिया प्रतिनिधि)।

जिसके विचार बड़े हैं, जो प्रत्येक जीव का भला करना चाहता है। उसके जीवन में पूर्णिमा की चांदनी होती है। जिसके विचार छोटे और जीव का भला नहीं कर सकता है। उसके जीवन में कितने ही उजाले आएं, लेकिन अमावस की रात की तरह अंधेरा ही रहता है। अच्छे विचार के लिए शास्त्र, पुराण, पुस्तक और ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। यह बात बिजपुरी गांव में गालव ऋषि मंदिर पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा में पंडित राजेन्द्र प्रसाद शास्त्री ने श्रद्घालुओं से कही। उन्होंने कहा कि शास्त्र जीवन को सदिश बनाते हैं। यानी व्यक्ति को सही दिशा देते हैं। पुराण जीवन को पूर्ण बनाते हैं। पुस्तक जीवन के द्वार पर ज्ञान को दस्तक देती है। ग्रंथ जीवन की गं्रथियां खोलते हैं। इसलिए विशेष पुस्तक और ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। अच्छे विचार ही मन को शुद्ध करते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में अच्छे विचारों को धारण करना चाहिए। बुरे विचार सदैव व्यक्ति को पतन की ओर ले जाते हैं। आज देखने में आया है कि युवा पीढ़ी बुरे विचारों के बीच फंसकर नशे का आदी होते जा रह हैं। ऐसे युवाओं को आध्यात्मिक गुरुओं का मार्गदर्शन होना बेहद जरूरी है।

शहर के अवंतीबाई छात्रावास में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में संत अनिल पाठक महाराज ने कहा भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों को चरित्र में उतारने से जीवन सार्थक हो जाता है। जीवन में हर पल व्यक्ति को सहारे की आवश्यकता पड़ती है। परंतु वह ईश्वर को उस वक्त याद करता है, जब उसके करीबी साथ छोड़ जाते हैं। जीवन को सार्थक बनाने के लिए हमें धर्म के पथ पर आगे बढ़कर सद्भाव से असहाय लोगों की मदद करनी चाहिए। जबकि दबोह के मुरावली गांव स्थित नारसिंह सिद्ध गुफा मंदिर पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा में मिथलेशदास महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक अवसर आते हैं, उसका लाभ उठाते रहने पर जीवन को उन्नाति के शिखर पर ले जाया जा सकता है। मानव को कल्याण के अवसर नहीं खोना चाहिए। परंतु पुरुषार्थ के अभाव में वह अवसरों को गवाता रहता है। महाराज ने कथा में आगे बताया किमनुष्य के जीवन में चार अवसर होते हैं। एक बचपन, दूसरा जवानी, तीसरा प्रौढ़ावस्था और अंतिम वृद्धावस्था। यह सभी अवसर अगर व्यक्ति दैनिक जीवन के कार्यों में व्यर्थ ही व्यतीत कर देता है तो वह अंत में मोक्ष के मार्ग पर नहीं पहुंच सकता। महाराजश्री ने कहा जब ज्ञान मार्ग से व्यक्ति भटक जाए तो उसका जीवन निरर्थक बन जाता है। भगवान कृष्ण ने कहा कि मृत्यु के बाद आदमी को दूसरा जीवन जीवन संभव है, लेकिन चरित्र मानव की ऐसी जीवन पूंजी है कि यदि उस पर आंच आ जाए तो उसे दुबारा वापस लाना संभव नहीं है। चरित्र का निर्माण करने में सालों साल लग जाते हैं।

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Posted By: Nai Dunia News Network

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