भिंड( नईदुनिया प्रतिनिधि)।

गति तो भगवान के हाथ में है पर शरणागत भक्तों के हाथ में है। जो मनुष्य जीते जी भगवान की भक्ति एवं भजनों के माध्यम से खुद को भगवान को अर्पण कर दें, तो तर्पण की कोई जरूरत नहीं रहेगी। मनुष्य कुछ समय भक्ति में लगाते हुए बाकी समय अपने घर, परिवार एवं अन्य कामों में देते हैं। इससे यह प्रतीत होता है, जैसे हम मंदिर में नारियल चढ़ाकर कुछ प्रसाद भगवान को चढ़ा कर बाकी घर परिवार में बांट देते हैं। इसी तरह घर का प्रमुख व्यक्ति जो भक्ति करता है वह अपनी भक्ति का कुछ अंश अपने परिवार को भी प्रसादी के रूप में बांट देता है। यह बात यदुनाथ नगर गली नंबर 1 में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में पंडित अशोक कृण्ण शास्त्री ने श्रद्धालुओं से कही

उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में 24 घंटे में से कम से कम ढाई घंटे ईश्वर भक्ति में लाना चाहिए। अपनी कमाई का 10 प्रतिशत हिस्सा दान भी करना चाहिए। इससे मनुष्य पुण्य कर ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है। श्री शास्त्री ने भजन मेरा क्या बिग़ड़ेगा गिरधारी जाएगी लाज तुम्हारी... सुनाते हुए कहा आत्माज्ञान बड़ी कठिनाई से मिलता है। जब वृक्ष जवान होता है, तो उसकी लकड़ी की कई वस्तुएं बनती है। परंतु वृक्ष जब बूढ़ा होता है और उसकी शाखाएं टेढ़ी -मेढ़ी होती है और उसमें पत्ते निकलने के बाद वह छांव देता है, परंतु उसकी शाखाओं की अन्य वस्तुएं वृक्ष के बूढ़े होने पर नहीं बनती। जिस घर में बड़े-बुजुर्ग होते हैं तो घर शोभा देता है।

श्री शास्त्री ने कहा कि इस मनुष्य जीवन में किसी को धन का नशा, किसी को प्रतिष्ठा का नशा, किसी को बड़प्पन का तो किसी को गांजे का नशा है। इन सभी नशों के अलावा एक वार भागवत कथा में जाकर भक्ति का नशा तो चढ़ा कर देखो। ईश्वर की भक्ति से मनुष्य इस जीवन में जो भी पाप किए हैं वह सारे धूल जाएंगे।

फोटो सहित क्रमांक 1,2

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