भिंड(नईदुनिया प्रतिनिधि)।

त्रेतायुग में रावण और द्वापर युग में कंस, कौरवों के रूप में बुराइयों ने अपना वर्चस्व जमा लिया था। पीड़ित मानवता की रक्षा के लिए प्रभु ने बारी -बारी से श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। उन्होंने विपरीत परिस्थियों में धैर्य और शौर्य को हथियार बनाकर बुराइयों का नाश करने की मिशाल पेश की जो आज तक हर इंसान के लिए प्रकाश स्तंभ का काम कर रही है। यह बात वाटर वक्स स्थित मंशादेवी मंदिर पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दौरान पंडित राधेश्याम शास्त्री ने श्रद्घालुओं से कही।

उन्होंने कहा जब ज्ञान मार्ग से व्यक्ति भटक जाए तो उसका जीवन निरर्थक बन जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि मृत्यु के बाद आदमी को दूसरा जीवन जीवन संभव है। चरित्र मानव की ऐसी जीवन पूंजी है कि यदि उस पर आंच आ जाए तो उसे दोबारा वापस लाना संभव नहीं है। चरित्र का निर्माण करने में सालों साल लग जाते हैं। श्री पाराशर ने कहा कि भक्ति के बेटे पल-पल मर रहे थे। भक्ति के बेटों का नाम ज्ञान और भक्ति था। ज्ञान विवेक के बिना नहीं बढ़ता। उन्होंने कहा नारद जी ने परमार्थ हाथ में लिया।

यह भी बोले महाराज

- बुराई हमेशा नहीं चलती। रावण ने अपने पराक्रम और सिद्धियों के दम पर चौदह भुवनों को जीत लिया था, लेकिन वह धर्म के रास्ते पर नहीं चल रहा था। आखिर उसका अंत बुरा हुआ।

- सच्चाई के रास्ते में शुरुआत में कठिनाइयां आ सकते हैं, लेकिन युगों तक प्रेरणा देने को सत्य वीरों को ही मिलते हैं। यही वजह है कि आज पूजा श्रीराम और श्रीकृष्ण की होती है। कंस और रावण की नहीं।

- माता-पिता का कहना मानने से हमेशा लाभ ही मिलता है। पिता के वचन के वचन का मान रखने के लिए प्रभु श्रीराम ने वनवास स्वीकार किया और इसी वनवास में घटी घटनाओं ने उन्हें ईश्वर के रूप में स्थापित किया।

फोटो सहित क्रमांक 12

Posted By: Nai Dunia News Network

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