मिहोना(नईदुनिया प्रतिनिधि)। व्यक्ति की पहचान अच्छे-बुरे कर्मों से होती है। व्यक्ति अपने जीवन में जो कर्म करता है उसे विधि कहते है। विधि कोई अन्य नहीं बनाता। बल्कि वह स्वयं ही विधि का निर्माण करता है, जो व्यक्ति अच्छे कार्य करता है उसके जीवन में अच्छे भाग्य (विधि) का निर्माण होता है और जो बुरे कार्य करते है उनके बुरे भाग्य (विधि) का निर्माण होता है। जीवन में किस व्यक्ति का भाग्य कब बदल जाए, इसे कोई नहीं जान सकता। यह बात मिहोना कस्बे के वार्ड 10 में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में पंडित आशीष महाराज ने श्रद्घालुओं से कही। कथा के दौरान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया गया।

कृष्ण जन्म के बाद पूरा पंडाल जगमगा उठा और नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की गूंज से पंडाल गूंज उठा। कथा व्यास ने सुंदर भजन गायन के द्वारा भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के आनंद को आनंदित कर दिया। भागवताचार्य ने कहा कि पाप जब बढ़ता है तो भगवान का अवतार होता है उनके अवतार से सब भक्तों का बेड़ा पार होता है। धर्म की स्थापना के लिए भगवान लेते हैं अवतार। उन्होंने कहा कि भाग्य जब अच्छा होता है, तो माता-पिता परिवार जनों की सोच से भी ऊपर का कार्य बेटा कर देता है। जब भाग्य प्रतिकूल होता है तो सोचते हुए भी व्यक्ति कुछ नहीं कर पाता है। जब हम संत परम्परा में देखते हैं। एक चोर जो रानी का हार चुकाकर भागा था, जिसके पीछे सिपाई दौड़ रहे थे। जिसके जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं था। क्षणभर में ही जिनकी मृत्यु हो सकती थी। लेकिन उसके भाग्य ने पलटा खाया और वे साधु बन गए। कठोर तपस्या कर मोक्ष प्राप्त किया। उन्होंने ने कहा कि हिन्दु साहित्य में वाल्मीक का भी ऐसा ही कुछ उदाहरण है कहने का अर्थ है, भाग्य को कोई नहीं जान सकता किव्यक्ति के पिछले जन्म में किए गए पुण्य या पाप का उदय कब आ जाए। इसलिए सुख चाहने वाले व्यक्ति को हमेशा अच्छे कार्य करना चाहिए।

जीवन में गुरु अवश्य होना चाहिएः

महाराजश्री ने कहा कि भक्ति की भाषा और भक्ति की धारणा एक अलग होती है। सिद्धांत एक अलग ही होता हैं। हमारे आचार्यों ने इस बात को कहीं किसी भी शास्त्र में नहीं लिखा किगुरु एक ही होना चाहिए। लेकिन यह जरूर लिखा है कि जीवन में गुरु अवश्य होना चाहिए। क्योंकि बिना गुरु के जीवन शुरू नहीं होता। इसलिए जब तक दीक्षा नहीं ली है।

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