भिंड(नईदुनिया प्रतिनिधि)। इंसान को मांगने से कुछ नहीं मिलता है, मिलता वही है जो परमात्मा चाहते हैं। लेकिन मनुष्य है कि दुख में ही भगवान को याद करता है सुख आने पर नहीं। सुख आए तो भगवान की दया और दुख आए तो कृपा मानकर स्वीकार करना चाहिए। संपत्ति तो सभी चाहते हैं लेकिन विपत्ति आने पर दोष भगवान पर मढ़ देते हैं। जन्म और मृत्यु जीवन के शाश्वत सत्य हैं, लेकिन मृत्यु का भय मनुष्य को हमेशा सताता रहता है। यह बात शहर के गौरी रोड रामचरन की बगिया में चल रही भागवतकथा के दौरान कथावाचक श्याम सुंदर पाराशर ने कही।

परासर ने कहा कि कलयुग धर्म पर टिका हुआ है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह कभी भी संतुष्ट नहीं होता है, निरंतर मांगता ही रहता है। सुख को दया और दुख को कृपा मानकर स्वीकार करना चाहिए। संपत्ति की चाहत तो सभी को है लेकिन विपत्ति की नहीं। कलयुग में आहार और व्यवहार बदल गया है। इसीलिए सामाजिक कुरीतियां व बुराइयां भी अपनी जड़ें जमा चुकी हैं। भजन में जब मन न लगे तो समझना चाहिए आहार सही नहीं है। इसलिए एक निश्चित दिनचर्या बनाकर इस पर अमल करना चाहिए। अपराधी को अपराध करने के बाद भी खौफ नहीं होता, इसलिए अपराध को नियंत्रित करने के लिए अपराधी को रोकना होगा। आज ऐसे लोग अपने को दबंग समझने लगे हैं। समाज में व्यक्ति कितना भी अच्छा काम कर ले नाम नहीं होता है लेकिन बुरा काम करने वाला अपराध करके भी चर्चित हो जाता है। भगवान रहते हुए भी दिखाई नहीं देते हैं। वे अंदर भी हैं और बाहर भी। भगवान को देखने के लिए सजल नेत्र चाहिए। परीक्षित ही एकमात्र जीव था, जिसने जन्म से पहले ही भगवान के दर्शन कर लिए। परीक्षित को मालूम था सातवें दिन मरना है पर संसार में किसी और को नहीं मालूम कि उसकी मृत्यु कब होगी। हां, इतना जरूर है कि जो जन्म लिया है वह एक दिन मृत्यु को अवश्य प्राप्त करेगा। इसलिए नित दिन अपने को प्रभु के भजन में लगाना चाहिए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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