अब्बास अहमद-भिंड (नईदुनिया प्रतिनिधि)। मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसे भिंड में चंबल नदी के बरही घाट पर बने कछुआ प्रजनन केंद्र ने दम तोड़ दिया है। दुर्लभ प्रजाति के कछुओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए नेशनल चंबल सेंक्चुरी के अंतर्गत प्रजनन केंद्र 2016 में शुरू किया गया था। 2018 में कछुओं की मौत और 2019 में प्रदेश के अलग-अलग केंद्रों से लाए गए अंडों के खराब हो जाने से इसे बंद कर दिया गया। अवैध रेत खनन कछुओं की मौत का बड़ा कारण रहा। वन विभाग रेत माफिया को तो रोक नहीं पाया इसलिए केंद्र ही बंद कर दिया।

राष्ट्रीय चंबल सेंक्चुरी में शुरू किया गया कछुआ प्रजनन केंद्र भ्रष्टाचार और खनन माफिया की भेंट चढ़ गया है। केंद्र में ऐसी प्रजातियों के कछुओं का कुनबा बढ़ रहा था, जिसे आइयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर लुप्तप्राय श्रेणी में रखा है। इनमें लाल मुकुट वाले बाटागुर कछुआ प्रमुख हैं। सेंक्चुरी के बरौली-ककरनीपुरा घाट, बटेश्वरा घाट, उसैद घाट, कनकपुरा घाट प्रमुख प्राकृतिक आवास हैं। सेंक्चुरी में कछुओं की नौ प्रजातियां हैं। इनमें से ज्यादातर ऐसी प्रजाति लुप्तप्राय श्रेणी की हैं। आइयूसीएन ने इन्हें रेड सूची में रखा है। चंबल नदी में बाटागुर कछुगा, बाटागुर डोंगोका, हार्डेला थुर्जी, पंगसूरा टेंटोरिया, पंगसूरा टेक्टा, निल्सोनिया गेंगेटिका, निल्सोनिया ह्यूरम, चित्रा इंडिगा, लेसिमस पंगटाटा प्रजाति के कछुए पाए जाते हैं। इनमंे बाटागुर कछुआ सिर्फ चंबल नदी में ही पाया जाता है।

कछुओं की मौत, अंडे खराब हुएः केंद्र में चंबल और देवरी घड़ियाल केंद्र से 269 कछुओं को शिफ्ट किया गया था। इनमें 70 बाटागुर डोंगोका, चार पंगसुरा टेंटोरिया, 195 बाटागुर कछुगा प्रजापति के कछुए थे। चंबल के अलावा यह प्रजाति मध्य नेपाल, उत्तरपूर्वी भारत, बांग्लादेश और बर्मा में पाई जाती है। 2018 के आखिर में मांस भक्षी कछुआ संरक्षण परियोजना के तहत कछुओं के 438 अंडे खराब हो गए थे। ये अंडे निल्सोनिया गेंगेटिक प्रजाति के कछुए के थे। बरही हैचरी में जब अंडों से बच्चे नहीं निकले तो इन्हें वापस देवरी घड़ियाल केंद्र मुरैना शिफ्ट किया गया था। इस पूरी प्रक्रिया में अंडे खराब हो गए थे। 2019 के शुरुआत में यहां एक्सपर्ट को ही हटा दिया गया था। इसका असर हुआ कि कछुओं की मौत होना शुरू हो गई।

केंद्र इसलिए भी जरूरीः सेंक्चुरी में अक्टूबर में मादा कछुआ रेत में घोंसले बनाकर अंडे देती हैं। इनमें से ज्यादातर अंडों को सेंक्चुरी के सियार खा जाते हैं। रेत खनन में भी इन अंडों को नुकसान पहंुचता है। केंद्र बनने से अंडों को सुरक्षित रखा जा सकता था।

वर्जन

प्रदेश का इकलौता कछुआ संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र बंद किया जाना गंभीर मामला है। मैं इस संबंध में वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और वन मंत्रालय में भी संपर्क करूंगी।

-संध्या राय, सांसद, भिंड-दतिया

बरही में कछुआ संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र कैंपा मद से बनाया गया था। केंद्र संचालित करने के लिए अब हमारे पास बजट नहीं आ रहा है। इससे केंद्र को अब बंद कर दिया है।

-अमित निकम, डीएफओ एवं अधीक्षक, राष्ट्रीय चंबल सेंक्चुरी

Posted By: Ajaykumar.rawat

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