भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)। दो से तीन माह से वेतन नहीं मिल रहा है। क्वारंटाइन व्यवस्था खत्म कर दी, इसलिए बाहर ठहरने की व्यवस्था नहीं है, घर जाना पड़ता है। खुद के साथ-साथ परिवार पर संक्रमण का खतरा है। मास्क, दस्ताने समय पर और पर्याप्त नहीं मिल रहे हैं। ड्यूटी से पहले पीपीई किट के लिए जूझना पड़ता है, मिल जाती है तो उसे पहनकर 8 से 10 घंटे ड्यूटी करना, जान को जोखिम में डालने जैसा है। कोरोना योद्धा प्रोत्साहन राशि का पता नहीं है। घर में ताने अलग मिल रहे हैं। पत्नी कह रही है कि छुट्टियां ले लो, बच्चों की शिकायत है कि आप ड्यूटी के समय फोन नहीं उठाते हैं। रिश्तेदारों से सलाह मिल रही है कि इतनी कठिनाईं हैं तो नौकरी छोड़ दीजिए, जान है तो जहान है।

ये हाल है प्रदेश में कोरोना से इस समय सीधी लड़ाई लड़ने वाले 1.48 लाख से अधिक स्वास्थ्य अधिकारी, कर्मचारियों का। इनमें 19 हजार संविदा और कोरोना से लड़ने के लिए रखे गए तीन हजार से अधिक अस्थाई अधिकारी, कर्मचारी और 85 हजार आशा कार्यकर्ता भी शामिल हैं। इन्हीं की बदौलत कोरोना संक्रमितों को खोजा रहा है, उनकी संपर्क हिस्ट्री खोजी जा रही है, उनके सैंपल लिए जा रहे हैं, सैंपलों की जांच की जा रही है। यहां तक कि अस्पतालों में कोरोना संक्रमितों का इलाज भी ये कर रहे हैं। यदि ये सिस्टम से परेशान रहेंगे तो कोरोना से लड़ी जा रही लड़ाई कमजोर पड़नी तय है।

सिस्टम से ऐसे हो रहे परेशान

19 हजार संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी

इन पदों पर सेवाएं दे रहे : महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन, बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता, कम्प्यूटर ऑपरेटर।

ये परेशानी : नियमित स्वास्थ्यकर्मी की तरह सेवाएं दे रहे हैं पर वेतन कम है, सुविधा नहीं मिलती। अलग नजरिए से देखते हैं, कभी भी निकालने की धमकी देते हैं। काम सबसे ज्यादा करते हैं, सुविधाएं सबसे कम और बाद में मिलती है। छह संविदा स्वास्थ्यकर्मी की मौत हो गई, उनकी कोई सुध नहीं ले रहा, उनके परिवार को कोई लाभ नहीं मिला।

40 हजार नियमित स्वास्थ्य अधिकारी, कर्मचारी

इन पदों पर दे रहे सेवाएं : चिकित्सक, रेडियोग्राफर, स्टाफ नर्स, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता, बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता, वार्ड ब्वॉय, लिपिक।

ये परेशानी : ड्यूटी लगाने में समानता नहीं, चेहरा देखकर ड्यूटी लगाने की शिकायतें, महंगाई, भत्ता, वेतन वृद्घि, एरियर्स की किश्त नहीं मिली। काम का दबाव अधिक, परिजनों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ रहा।

4 हजार अस्थाई स्वास्थ्यकर्मी

इन पदों पर दे रहे सेवाएं : मेडिकल चिकित्सक, डेंटल व होम्योपैथी चिकित्सक, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, स्टाफ नर्स व जिलों में जरूरत के हिसाब से अन्य पदों पर रखे गए स्वास्थ्यकर्मी।

ये परेशानी : पूर्व में अप्रैल, मई, जून के लिए रखा था। संक्रमण बढ़ा तो तीन महीने की अवधि और बढ़ा दी है। इनमें से कई को दो महीने और कुछ को एक माह का वेतन मिला है। बाकी के माह का वेतन नहीं मिला है।

85 हजार आशा कार्यकर्ता, सहयोगिनी इन परेशानियों का कर रहीं सामना

इन पर 62 प्रकार की जांच की जिम्मेदारी हैं। गर्भवती महिलाओं की देखरेख का पूरा जिम्मा इन पर है। कोरोना संक्रमण के चलते घर-घर जा रही हैं पर मानदेय दो हजार रुपये है, दस्ताने और मास्क का पता नहीं है। जान जोखिम में डालकर पूरे दिन गांव-गांव घूम रही हैं। इस समय तमाम अधिकारी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं और कोरोना नियंत्रण पाने के लिए इन्हीं पर निर्भर हैं।

नियमित, संविदा, अस्थाई स्वास्थ्यकर्मी व आशा कार्यकर्ता इन समस्याओं से भी जूझ रहे

- दस्ताने, मास्क समय पर व पर्याप्त नहीं मिल रहे हैं। सैंपल व जांच करते समय एक ही दस्ताने पहनकर अधिक मरीजों की जांच करने, उन्हें देखने पर वे और उनके परिजन आपत्ति ले रहे हैं। जलील करते हैं। विवाद हो रहे हैं।

- पीपीई किट पर्याप्त नहीं मिल रही हैं। मिल भी जाती हैं तो उन्हें पहनकर 8 से 10 घंटे तक ड्यूटी करना बहुत मुश्किल हो रहा है। कई तरह की शिकायतें आ रही हैं। घबराहट का सामना करना पड़ रहा है। इसका कोई विकल्प नहीं है।

- कोरोना योद्घा के रूप में हर माह 10 हजार रुपये प्रोत्साहन राषि मिलने के प्रावधान है। अभी तक एक रुपये किसी भी कर्मचारी, अधिकारी को नहीं मिले हैं।

- सप्ताह में पांच से छह दिन तक ड्यूटी करने के बाद संबंधित डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मियों को क्वारंटाइन किया जाता है। ताकि वे घर न जाए और बाहर ही रहे, ताकि उनका परिवार सुरक्षित रहे। यह व्यवस्था जून के आखिरी सप्ताह से खत्म कर दी है। ड्यूटी करने के बाद सीधे घर जाना पड़ता है, परिवार भी संक्रमण के खतरे में है।

प्रदेश के आम आदमी पर असर

- ये सभी नाराज हो गए तो काम बंद करेंगे, आम आदमी परेशान हो जाएगा। कोरोना संक्रमण से बचना मुश्किल होगा।

- अस्पतालों से लेकर गांव, शहर तक मरीज परेशान होंगे। सिस्टम ठप पड़ जाएगा।

कर्मचारियों को आम आदमी का साथ

प्रदेश के जागरूक नागरिक निरंजन वाधवानी कहते हैं कि यदि स्वास्थ्यकर्मी एक दिन नाराज होकर काम बंद कर देंगे तो सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठ जाएगी और आम आदमी परेशान हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि इनकी वाजिब मांगों को समय से पूरा करें, जो मांगे तर्कसंगत नहीं हैं, उन पर संवाद करें और काम करने योग्य माहौल बनाए रखें। इसी में प्रदेश की भलाई है। प्रदेश के कई नागरिक इस राय से सहमत हैं।

संविदाकर्मी कोरोना संक्रमण में जी जान लगाकर ड्यूटी कर रहे हैं, लेकिन समस्याएं कहीं न कहीं कचोट रही हैं। यही होता रहा तो मनोबल तो गिरेगा, काम भी प्रभावित होगा। - सौरभ सिंह चौहान, अध्यक्ष संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ

जान जोखिम में डालकर अस्थाई नौकरी कर रहे हैं। सरकार हमें भी 10 हजार रुपये कोरोना प्रोत्साहन राशि व मुख्यमंत्री कोरोना योद्घा योजना में शामिल करती तो अच्छा रहता, पर कुछ नहीं हो रहा है। -विपिन दुबे, आयुष चिकित्सा अधिकारी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हनमना, रीवा

जोखिम लेकर स्वास्थ्य कर्मचारी काम कर रहे हैं। सरकार को तो वाजिब सुविधाओं में कमी नहीं आनी देनी चाहिए। पर वेतन रोकते हैं, वेतन वृद्घि नहीं दी, एरियर्स रोक लिया, महंगाई भत्ता हड़प लिया। असंतोष तो पैदा होगा। कर्मचारी अपने कर्तव्यों पर चलेंगे और सरकार सुविधा में कटौती करती रहेगी, ऐसा नहीं होना चाहिए। - एसबी सिंह, प्रदेश अध्यक्ष, मप्र स्वास्थ्य कर्मचारी संघ

सारे काम हो रहे हैं, खर्चे भी बराबर किए जा रहे हैं। बस कर्मचारियों का नाम आए तो कोरोना संक्रमण का हवाला देने लगते हैं। ऐसे काम थोड़ी चलेगा। बातें तो सुननी पड़ेंगी, सुविधाएं भी देनी होंगी। आर्थिक तंगी का सवाल है तो उसका बोझ अकेले स्वास्थ्यकर्मियों पर ही क्यों पड़ना चाहिए। अब तो घरों में भी एक बात आम हो गई है, परिवार कह रहा है कि पूरा काम करने के बाद भी सुविधाएं नहीं हैं तो कैसे काम करते हो। - लक्ष्मीनारायण शर्मा, कर्मचारी नेता, मप्र

Posted By: Nai Dunia News Network

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