भोपाल (नवदुनिया रिपोर्टर)। राजधानी में स्थित मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में चल रही गमक श्रृंखला के अंतर्गत शुक्रवार रात को आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा शीलू सिंह राजपूत एवं साथी, रायबरेली का आल्हा गायन हुआ तथा भोपाल के अग्नेश केरकेट्टा और साथियों द्वारा उरांव जनजातीय नृत्य की प्रस्‍तुति दी गई ।

शीलू सिंह राजपूत व उनके साथियों ने आल्हा गायन में बूंदी गढ़ की लड़ाई पर आधारित प्रस्तुति दी। आल्हा वास्‍तव में बुंदेलखंड में वीरगाथाओं के लेखन और गायन की एक शैली है। आल्हा छंद में लिखी आल्हाखंड की पंक्तियां आज भी नौजवानों की रगों में जोश भर देती हैं। मप्र और उप्र के बुंदेलखंड क्षेत्र में आल्‍हा गायन बहुत लोकप्रिय है।

प्रस्तुति में माहिल मामा ऊदल की हत्या के लिए रानी तिलका से कहते हैं कि ऊदल को बूंदी अकेले भेजो और बूंदी के राजा को पत्र लिखकर उसकी खबर कर दो। रानी ऐसा ही करती है। बूंदी में ऊदल को बंदी बना लिया जाता है। यहां से आल्हा और लाखन फौज लेकर जाते हैं। बूंदी के राजा से आल्हा और लाखन युद्ध कर ऊदल को छुड़ा लेते हैं और लाखन का गौना करा कर ले आते हैं। यह वृत्‍तांत ओजपूर्ण शैली में गीत के माध्यम से सुनाया गया।

सुश्री राजपूत ने 15 वर्ष की आयु से ख्यात आल्हा गायक स्व. लल्लू बाजपेयी से आल्हा गायन की शिक्षा लेना आरंभ कर दिया था। मंच पर क्लारनेट पर सोहनलाल, ढोलक पर सर्वेश कुमार, झीका पर पवन कुमार, दंडताल पर राजबहादुर एवं संजय ने तलवारधारी के रूप में संगत दी।

इससे पहले कार्यक्रम में अग्नेश केरकेट्टा व साथियों ने हरे किंदा कदीन..., आदि उरांव जनजाति के गीतों पर नृत्य प्रस्तुति दी। सुश्री केरकेट्टा के साथ मंच पर लिली खलखो, सीमा तिग्गा, सीमा तिर्की, माधुरी टोप्पो, हेमलता कुजूर, एलिजावेद कुजूर, आशा सेस्स, नेहा सेस्स, दुलारी तिर्की ने एवं वादन में पुजिन तिर्की, डेविड टोप्पो, अलेक्‍जेंडर कुजूर एवं स्तानिसलास खलखो ने संगत दी। इस नृत्य में लोगों ने आदिवासी जीवन का आनंद लिया।

Posted By: Ravindra Soni

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