सुशील पांडेय, भोपाल। जिस तरह भारत की आजादी के आंदोलन में पंजाब के अमृतसर में हुए जलियांवाला बाग की घटना को याद किया जाता है, ठीक वैसी ही स्मृतियां मध्य प्रदेश के बोरास कांड को लेकर हैं। यह हत्याकांड भोपाल रियासत के स्वतंत्र भारत में विलय के लिए हुए आंदोलन के दौरान हुआ था। 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति पर हुए उसी बोरास कांड की आज बरसी है।

बलिदान की यह कहानी कुछ यूं है कि भोपाल के समीप स्थित रायसेन जिले में नर्मदा तट पर बसे बोरास गांव में 14 जनवरी 1949 को संक्रांति का मेला लगा था। बोरास तब भोपाल रियासत में आता था। उस दौर में पूरे देश में विभिन्न् राजे-रजवाड़ों और नवाबों की रियासतों को भारतीय गणतंत्र में शामिल किया जा रहा था।

विलीनीकरण के उस दौर में देशभर में उन रियासतों की प्रजा आंदोलन कर रही थी, जो भारतीय गणराज्य में शामिल होने में नानुकुर कर रहे थे। भोपाल रियासत भी उन्हीं में से एक थी क्योंकि भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खान भारत में शामिल होना नहीं चाहते थे, जबकि भोपाल की प्रजा चाहती थी कि स्वतंत्र भारत में शामिल हों। इसी कड़ी में चल रहे आंदोलन के तहत आंदोलनकारियों ने बोरास के मेले में तिरंगा ध्वज फहराने का फैसला किया। भोपाल के नवाब की पुलिस ने तिरंगा फहराने से मना कर दिया।

कठोर पहरे के बावजूद एक 25 वर्षीय आंदोलनकारी धनसिंह व साथियों ने वंदे मातरम् गाते हुए तिरंगा लहरा दिया। इस पर भोपाल रियासत के जाफर नामक थानेदार ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां चलवा दीं। घटना में छह आंदोलनकारी बलिदान हो गए, इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने तिरंगे को जमीन पर नहीं गिरने दिया। पुलिसकर्मी तिरंगा थामने वाले एक आंदोलनकारी को गोली मारते तो दूसरा उस तिरंगे को गिरने से पहले थाम लेता।

जून 1949 को मिली भोपाल को आजादी

भोपाल स्वातंत्र्य आंदोलन स्मारक समिति के सचिव और इतिहासकार डॉ. आलोक गुप्ता बताते हैं, बोरास कांड में छह निहत्थे आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर आग की तेजी से भोपाल रियासत में फैल गई। लोग आक्रोशित हुए और भोपाल को भारत में मिलाने के लिए आंदोलन शुरू हो गया।

इसे विलीनीकरण आंदोलन या मर्जर मूवमेंट के नाम से जाना जाता है। आंदोलन में पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने भी अपनी युवावस्था में प्रमुख भूमिका निभाई थी। बोरास कांड में निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली चलाने की दुखद खबर सरदार वल्लभ भाई पटेल को भी दी गई। उन्होंने तुरंत हस्तक्षेप किया। अंतत: 30 अप्रैल 1949 को मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए और भारत की आजादी के लगभग दो साल बाद 1 जून 1949 को भोपाल स्वतंत्र भारत का अंग बन सका।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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