खास बातें

- कल्चुरी शासकों के हमले से बचने परमार वंश के राजाओं ने कराया था निर्माण

- 15 फीट ऊंची 10 फीट चौड़ी दीवार को 80 किमी तक नापा जा चुका है

- संरक्षण के अभाव में जमींदोज होती जा रही है यह दीवार

- इंटरलॉकिंग पद्घति से जुड़े हैं दीवार के पत्थर

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अम्बुज माहेश्वरी

रायसेन। नवदुनिया

दुनिया की सबसे लंबी चीन की दीवार जैसी ही दीवार भारत में भी है। रायसेन जिले के देवरी के पास गोरखपुर के जंगल से बाड़ी के चौकीगढ़ किले तक 15 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी यह दीवार करीब एक हजार साल पुरानी है। इसकी लंबाई 80 किमी है, लेकिन संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है। मालूम हो कि दूसरी शताब्दी में चीन के पहले सम्राट किन शी हुआंग ने भी चीन की दीवार का निर्माण विदेशी हमलों से मिंग वंश को बचाने के लिए किया था। जिसे दुनिया की सबसे बड़ी दीवार कहा जाता है।

10-11वीं शताब्दी में कल्चुरी शासकों के हमले से बचने के लिए परमार वंश के राजाओं द्वारा इंटरलॉकिंग सिस्टम से बनवाई गई यह दीवार भारत की सबसे लंबी दीवार मानी गई है। केंद्र और राज्य सरकार के कई प्रतिनिधि मंडल इसे देखने लेकिन इसके संरक्षण को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हुई। उदयपुरा के पास देवरी कस्बे से लगे गोरखपुर गांव के जंगल से शुरू होकर यह दीवार बाड़ी बरेली क्षेत्र में आने वाले चौकीगढ़ किले तक जाती है। भोपाल से गोरखपुर गांव की दूरी करीब 200 किमी है। पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि 10-11वीं शताब्दी के मध्य परमार कालीन राजाओं ने इसे बनवाया था। बनावट से स्पष्ट होता है कि यह दीवार परमार कालीन राज्य की सुरक्षा दीवार रही होगी।

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कई जगह से टूट रही दीवार

80 किमी के दायरे में अब यह कई जगह से टूट गई है। इसकी सामान्य ऊंचाई 15 फीट और चौड़ाई 10 से 12 फीट है। कई जगह पर तो इसकी चौड़ाई 24 फीट तक देखने को मिलती है। गोरखपुर की इस दीवार को बनाने में लाल बलुआ पत्थर की बड़ी चट्टानों का इस्तेमाल किया गया है। हर पत्थर में त्रिकोण आकार के गहरे खांचे बने हुए हैं, जिनसे पत्थरों की इंटरलॉकिंग की गई है।गोरखपुर से 8 किमी दूर मोघा डैम पर इस दीवार का काफी हिस्सा आज भी सुरक्षित है।

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क्षेत्र में बिखरी है बेशकीमती मूर्तियां

गांव के ही एक आश्रम में रहने वाले सुखदेव महाराज बताते हैं कि पूरे क्षेत्र में प्राचीन बेशकीमती मूर्तियों के अवशेष इधर- उधर बिखरे पड़े हैं। दीवार के आसपास भगवान शिव, विष्णु, भैरव और सूर्य के मंदिर भी मिले हैं। 10-11वीं सदी की कई बावड़ी, तालाब, मंदिर, तहखाने भी यहां हैं, जिनमें ज्यादातर जमींदोज हो चुके हैं। दीवार के सहारे बने कुछ परकोटे भी हैं, जिनके अंदर सांची के स्तूप में पाए गए बौद्घ विहारों की तरह घरों के अवशेष मिले हैं, जो सैकड़ों की संख्या में हैं।

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इनका कहना है

आपने जैसा बताया है, अगर वैसा है तो यह बेहद महत्वपूर्ण है। इस धरोहर के संरक्षण और विस्तार के लिए हम योजनाबद्घ तरीके से काम करवाएंगे।

- प्रहलाद सिंह पटेल, केंद्रीय पर्यटन मंत्री

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जिले की ऐतिहासिक संपदा में यह बहुत महत्वपूर्ण है। जिले के लिए गौरव की बात है। जिला स्तर पर हम जो भी बेहतर कर सकते हैं, वो किया जाएगा।

- उमाशंकर भार्गव, कलेक्टर रायसेन

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Posted By: Nai Dunia News Network

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